अपने ही समुदाय से आलोचना झेलनी पड़ी, क्योंकि मैंने क्रीमी लेयर सिद्धांत का समर्थन किया: पूर्व CJI गवई

**EDS: THIRD PARTY IMAGE** In this image received on Nov. 8, 2025, Prime Minister Narendra Modi with Chief Justice of India BR Gavai during the inauguration of national conference on strengthening legal aid delivery mechanisms, at the Supreme Court, in New Delhi. (PMO via PTI Photo)(PTI11_08_2025_000338B)

मुंबई, 7 दिसंबर (पीटीआई) पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी. आर. गवई ने कहा कि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू किए जाने संबंधी एक निर्णय में अपनी टिप्पणी के लिए उन्हें अपने ही समुदाय के लोगों द्वारा “काफी आलोचना” का सामना करना पड़ा है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए गवई ने कहा कि आंबेडकर के अनुसार, सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण) उस व्यक्ति को साइकिल देने जैसा है जो पीछे छूट रहा है। उन्होंने पूछा कि क्या आंबेडकर यह मानते थे कि वह व्यक्ति कभी भी साइकिल छोड़ना ही नहीं चाहिए? ऐसा नहीं था, उन्होंने दावा किया।

हाल ही में सेवानिवृत्त हुए पूर्व CJI गवई शनिवार को मुंबई विश्वविद्यालय में “समान अवसर को बढ़ावा देने में सकारात्मक कार्रवाई की भूमिका” विषय पर एक व्याख्यान दे रहे थे।

आंबेडकर की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए गवई ने कहा कि वह न केवल भारतीय संविधान के निर्माता थे बल्कि उसमें निहित सकारात्मक कार्रवाई के भी जनक थे।

उन्होंने कहा, “बाबासाहेब का मानना था कि सकारात्मक कार्रवाई साइकिल देने जैसी है… कोई दसवें किलोमीटर पर है और कोई शून्य पर, तो बाद वाले को साइकिल दी जानी चाहिए ताकि वह जल्दी दसवें किलोमीटर तक पहुंच सके। उसके बाद दोनों साथ चल सकते हैं। लेकिन क्या उन्होंने यह सोचा था कि वह व्यक्ति साइकिल कभी नहीं छोड़े और दूसरों को हमेशा शून्य किलोमीटर पर ही रहने के लिए कहे?”

पूर्व CJI ने कहा, “मेरे विचार में यह बाबासाहेब की सामाजिक और आर्थिक न्याय की परिकल्पना नहीं थी। वह वास्तविक अर्थों में न्याय चाहते थे, न कि औपचारिक रूप में।”

गवई ने कहा कि ‘इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार’ मामला क्रीमी लेयर सिद्धांत को स्थापित करता है और एक अन्य मामले में उन्होंने स्वयं यह कहा था कि यह सिद्धांत अनुसूचित जातियों पर भी लागू होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सिद्धांत यह मांग करता है कि जो लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं, वे भले ही पिछड़े वर्ग से हों, उन्हें सकारात्मक कार्रवाई का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

गवई ने कहा कि इस निर्णय के लिए उन्हें अपने ही समुदाय से “काफी आलोचना” झेलनी पड़ी और आरोप लगाया गया कि उन्होंने खुद आरक्षण का लाभ लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद दूसरों को इससे वंचित करने की वकालत की।

लेकिन ये आलोचक यह भी नहीं जानते कि उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के लिए कोई आरक्षण नहीं है, उन्होंने कहा।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या CJI या मुख्य सचिव के बेटे और ग्राम पंचायत स्कूल में पढ़ने वाले मजदूर के बेटे पर एक ही पैमाना लागू करना संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को संतुष्ट कर सकता है?

गवई ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में सकारात्मक कार्रवाई ने “निश्चित रूप से सकारात्मक भूमिका” निभाई है।

उन्होंने कहा, “मैं देश-दुनिया में घूम चुका हूं, और मैंने कई अनुसूचित जाति के लोगों को मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, राजदूत और उच्चायुक्त बनते देखा है।”

गवई ने कहा कि महाराष्ट्र सामाजिक सुधारकों की भूमि है और इसे “आधुनिक भारत के विचार की जन्मस्थली” कहा जा सकता है।

उन्होंने कहा, “हम सब ज्योतिराव फुले और Savitribai Phule के समाज में असमानताओं को दूर करने के प्रयास से भलीभांति परिचित हैं।”

उन्होंने कहा कि जब समाज में महिलाएं सबसे ज्यादा उत्पीड़ित थीं, तब फुले दंपति ने उनके लिए शिक्षा के द्वार खोले। पीटीआई AVI KRK GK