नई दिल्ली, 13 जून (पीटीआई)
ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) के अध्यक्ष कल्याण चौबे ने शुक्रवार को स्वीकार किया कि हाल के दिनों में राष्ट्रीय टीम मैच जीतने के लिए संघर्ष कर रही है, खासकर एएफसी एशियन कप क्वालीफाइंग में हांगकांग से 0-1 की अप्रत्याशित हार के बाद। इस हार के बाद भारत के लगातार तीसरी बार महाद्वीपीय टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई करने की उम्मीदों को झटका लगा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में चौबे ने माना कि टीम के खराब प्रदर्शन का एक बड़ा कारण भारतीय स्ट्राइकरों की कमी है। उन्होंने कहा कि घरेलू क्लबों में स्ट्राइकर के रूप में खेलने वाले भारतीय खिलाड़ियों की संख्या बढ़ाने के लिए सभी हितधारकों के साथ मिलकर चर्चा की जाएगी।
चौबे ने कहा, “किसी भी खेल की लोकप्रियता के लिए जरूरी है कि राष्ट्रीय टीम अच्छा प्रदर्शन करे। यह सच है कि हमारी टीम मलेशिया, वियतनाम, बांग्लादेश, थाईलैंड और हांगकांग जैसी टीमों के खिलाफ जीत दर्ज करने में संघर्ष कर रही है। लेकिन गोल किए बिना जीत की उम्मीद करना अवास्तविक है।”
उन्होंने कहा, “यह साफ तौर पर दिखाता है कि हमारे पास प्रभावी भारतीय स्ट्राइकरों की कमी है। जरूरी है कि भारतीय स्ट्राइकरों को मैच खेलने का अधिक मौका मिले। इसके लिए सभी हितधारकों को मिलकर व्यावहारिक और सामूहिक रोडमैप बनाना होगा। एक उपाय यह हो सकता है कि घरेलू लीग में विदेशी खिलाड़ियों की संख्या धीरे-धीरे कम की जाए, जिससे भारतीय स्ट्राइकरों को ज्यादा मौका मिले।”
आईएसएल में स्ट्राइकर के रूप में खेलने वाले भारतीय खिलाड़ियों की संख्या कम होने का मुद्दा कई कोच और पूर्व खिलाड़ी पहले भी उठा चुके हैं।
चौबे ने कहा कि विदेशी खिलाड़ियों की संख्या सीमित करने का फैसला एआईएफएफ अकेले नहीं ले सकता, इसके लिए सभी हितधारकों की सहमति जरूरी है।
कोच मनोलो मार्केज़ के भविष्य पर चौबे ने कहा कि 29 जून को कार्यकारी समिति की बैठक में इस विषय पर चर्चा होगी और तकनीकी समिति की राय भी ली जाएगी।
एक प्रेजेंटेशन में दिखाया गया कि कोच स्टीफन कॉन्स्टेंटाइन के कार्यकाल में टीम ने प्रति मैच 1.64 गोल किए और जीत प्रतिशत 57% था। इगोर स्टिमैक के समय यह आंकड़ा 1.01 गोल और 35% जीत रहा, जबकि मार्केज़ के कार्यकाल में अब तक 0.75 गोल प्रति मैच और सिर्फ 13% जीत प्रतिशत रहा।
चौबे ने कहा, “पिछले 10 वर्षों में हमने सकारात्मक स्ट्राइकर तैयार नहीं किए हैं। हम निश्चित रूप से सुनील छे

