आवारा कुत्तों का मामला: सड़कों से हर कुत्ते को हटाने का निर्देश नहीं दिया गया है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा

Chennai: Volunteers hold placards during a protest, in Chennai, Sunday, Nov. 23, 2025. The demonstration comes in response to a Supreme Court order for the removal of stray dogs from the capital following a rise in dog-bite incidents. (PTI Photo/R SenthilKumar)(PTI11_23_2025_000147B)

नई दिल्ली, 8 जनवरी (पीटीआई) सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि उसने सड़कों से हर कुत्ते को हटाने का निर्देश नहीं दिया है। अदालत ने कहा कि निर्देश केवल यह है कि आवारा कुत्तों के साथ पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के अनुसार व्यवहार किया जाए।

आवारा कुत्तों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि कुत्ते उन लोगों की गंध पहचान सकते हैं जो उनसे डरते हैं या जिन्हें पहले कुत्ते ने काटा हो, और ऐसे लोगों पर वे हमला कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन. वी. अंजारिया की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ इस मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें डॉग लवर्स द्वारा पूर्व आदेशों में संशोधन की मांग और निर्देशों के सख्त अनुपालन से जुड़ी याचिकाएं शामिल हैं।

न्यायमूर्ति मेहता ने कहा, “हमने सड़कों से हर कुत्ते को हटाने का निर्देश नहीं दिया है। निर्देश यह है कि उनके साथ नियमों के अनुसार व्यवहार किया जाए।”

पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता सी. यू. सिंह, कृष्णन वेणुगोपाल, ध्रुव मेहता, गोपाल शंकरनारायणन, श्याम दिवान, सिद्धार्थ लूथरा और करुणा नुंडी सहित कई वकीलों की दलीलें सुनीं।

शुरुआत में, मामले में अमिकस क्यूरी के रूप में अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने पीठ को बताया कि चार राज्यों ने बुधवार को अपने अनुपालन हलफनामे दाखिल किए हैं।

दलीलों के दौरान सी. यू. सिंह ने कहा कि दिल्ली जैसे शहरों में चूहों की समस्या है और राष्ट्रीय राजधानी में बंदरों की भी एक अलग समस्या है। उन्होंने कहा कि अगर कुत्तों को अचानक हटा दिया गया, तो चूहों की संख्या बढ़ सकती है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

इस पर न्यायमूर्ति मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, “कुत्ते और बिल्लियां दुश्मन होते हैं। बिल्लियां चूहों को मारती हैं, तो हमें ज्यादा बिल्लियों को बढ़ावा देना चाहिए।” सिंह ने स्पष्ट किया कि वे अदालत के आदेशों पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, बल्कि केवल उन्हें व्यावहारिक रूप से संशोधित करने का अनुरोध कर रहे हैं।

पीठ ने सवाल किया, “बताइए, हर अस्पताल में कितने कुत्तों को गलियारों, वार्डों और मरीजों के बिस्तरों के पास घूमने की अनुमति होनी चाहिए?” इस पर सिंह ने कहा कि शीर्ष अदालत का उद्देश्य निर्विवाद है और अदालत ने यह सही तौर पर देखा है कि एबीसी नियमों और पूर्व आदेशों का पालन नहीं किया गया।

वरिष्ठ अधिवक्ता वेणुगोपाल ने कहा कि अस्पतालों में कुत्तों की कोई जगह नहीं है और अब तक नियमों को लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई है। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों के क्रियान्वयन के लिए कोई बजटीय प्रावधान नहीं किया गया।

एक अन्य वरिष्ठ वकील ने आवारा कुत्तों की जनगणना और सटीक आंकड़ों की आवश्यकता पर जोर दिया। जब एक वकील ने कुत्तों के आश्रय स्थलों सहित बुनियादी ढांचे की कमी का मुद्दा उठाया, तो पीठ ने कहा, “हम सभी इस बारे में सचेत हैं।”

पीठ ने पूछा, “क्या पालतू कुत्तों के लिए अनिवार्य माइक्रो-चिपिंग वास्तव में हो रही है?” एक वकील ने जवाब दिया कि फिलहाल ऐसा नहीं हो रहा है, लेकिन यह होना चाहिए।

न्यायमूर्ति नाथ ने यह भी टिप्पणी की कि कुत्ता उस इंसान को पहचान सकता है जो उससे डरता है या जिसे पहले कुत्ते ने काटा हो, और वह उस पर हमला कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई पालतू कुत्ता अनजाने में भी पड़ोसी पर हमला कर देता है, तो वह भी अपराध की श्रेणी में आता है।

कई वकीलों ने समस्या के समाधान के लिए अपने सुझाव रखे। सुनवाई अधूरी रही और इसे शुक्रवार को जारी रखा जाएगा।

सुनवाई के अंत में न्यायमूर्ति मेहता ने 29 दिसंबर 2025 को अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसका शीर्षक था — “दुनिया की छत पर, आवारा कुत्ते लद्दाख की दुर्लभ प्रजातियों का शिकार कर रहे हैं।” उन्होंने वकीलों से कहा कि वे इस रिपोर्ट का अध्ययन कर अगली सुनवाई में तैयार रहें।

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने नागरिक निकायों द्वारा नियमों और निर्देशों के पालन न किए जाने पर चिंता जताई थी और कहा था कि देश में लोग न केवल कुत्तों के काटने से बल्कि सड़कों पर आवारा जानवरों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं से भी मर रहे हैं।

7 नवंबर को अदालत ने शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे क्षेत्रों में कुत्तों के काटने की घटनाओं में “चिंताजनक वृद्धि” को देखते हुए निर्देश दिया था कि आवारा कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद तुरंत निर्धारित आश्रय स्थलों में स्थानांतरित किया जाए और उन्हें उसी स्थान पर दोबारा न छोड़ा जाए, जहां से उन्हें पकड़ा गया हो।

अदालत ने राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों तथा एक्सप्रेसवे से सभी मवेशियों और अन्य आवारा जानवरों को हटाने के भी निर्देश दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कई निर्देश पारित कर चुका है। यह स्वतः संज्ञान लिया गया मामला है, जिसकी शुरुआत पिछले वर्ष 28 जुलाई को राष्ट्रीय राजधानी में, विशेषकर बच्चों में, कुत्तों के काटने से रेबीज फैलने से जुड़ी एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर की गई थी।

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