नैनीताल, 1 जनवरी (PTI) – बागेश्वर जिले के गांवों में कथित रूप से अवैध साबुन पत्थर खनन के कारण विकसित हुई दरारों की जांच के लिए उत्तराखंड उच्च न्यायालय के निर्देश पर एक समिति का गठन किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायाधीश सुभाष उपाध्याय की पीठ ने सभी खानों का निरीक्षण करने का निर्देश दिया है और समिति से कहा है कि वह दो सप्ताह के भीतर न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपे।
न्यायालय ने कंडा तहसील और बागेश्वर जिले के अन्य गांवों में घरों में दरारों से संबंधित कई स्वयं संज्ञान पीआईएल और 165 खनन इकाइयों से संबंधित अन्य याचिकाओं पर सुनवाई की है।
समिति में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अजय रावत और नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के वैज्ञानिक एवं अन्य शामिल हैं।
स्थानीय लोगों ने कहा कि समय के साथ बढ़ती भूमि धंसाव की समस्या क्षेत्र में बड़े पैमाने पर साबुन पत्थर खनन और ठेकेदारों द्वारा खुदाई की गई खाइयों को बिना उपचार छोड़े जाने के कारण हुई, जो अक्सर खनन नियमों का उल्लंघन करके ब्लास्टिंग और भारी मशीनरी का उपयोग करते थे।
कंडा तहसील के ग्रामीणों ने पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कथित अवैध साबुन पत्थर खनन से हुए नुकसान की जानकारी दी थी।
पत्र में आरोप लगाया गया था कि खनन गतिविधियों के कारण गांवों की कृषि भूमि, घर, जल आपूर्ति लाइन्स और अन्य बुनियादी सुविधाएं गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं।
इसमें यह भी कहा गया कि अधिक संसाधन वाले लोग हाल्द्वानी और अन्य शहरों में चले गए हैं, और अब मुख्य रूप से गरीब निवासी गांवों में रहते हैं।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि “खनन माफिया” उनके आजीविका के साधनों पर कब्जा करने की योजना बना चुका है, भले ही संबंधित अधिकारियों को कई ज्ञापन सौंपे गए हों।
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