कानून मंत्री मेघवाल ने संस्थागत मध्यस्थता को बताया भारतीय संस्कृति का हिस्सा

नई दिल्ली, 14 जून (पीटीआई)

कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने शनिवार को संस्थागत मध्यस्थता (Institutional Arbitration) को बढ़ावा देने की बात कही और इसे भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बताया। वे यहां एक सम्मेलन में बोल रहे थे, जहां ओएनजीसी के चेयरमैन ने मध्यस्थता की प्रक्रिया को समयबद्ध और प्रभावी बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

मेघवाल ने कहा कि संगठनों को समय और परिस्थिति के अनुसार लचीला और कठोर—दोनों रहना चाहिए, ताकि उनके हित सुरक्षित रहें और वे राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकें। उन्होंने अधिकारियों से आग्रह किया कि वे जोखिम लेने के लिए तैयार रहें और पारंपरिक रास्ते से हटकर संगठन के वित्तीय हितों की रक्षा करें।

उन्होंने यह भी कहा कि मध्यस्थता भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही है, लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ गई और अन्य देश अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के केंद्र बन गए। मंत्री ने उम्मीद जताई कि भारत जल्द ही अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का नया केंद्र बनेगा।

ओएनजीसी के चेयरमैन अरुण कुमार सिंह ने कहा कि “समय ही पैसा है”, इसलिए मध्यस्थता की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि व्यावसायिक विवादों का शीघ्र समाधान व्यवसायिक माहौल के लिए आवश्यक है और मध्यस्थता को “अधिक कॉरपोरेट और कम कानूनी” बनाया जाना चाहिए।

कानून सचिव अंजू राठी राणा ने बताया कि सरकार लगातार मध्यस्थता और सुलह प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने के प्रयास कर रही है। हाल ही में विधि विभाग ने न्यायिक हस्तक्षेप कम करने और संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देने का निर्देश भी दिया है।

इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर के चेयरमैन जस्टिस (सेवानिवृत्त) हेमंत गुप्ता ने कहा कि पक्षकारों की मानसिकता बदलनी होगी और कोर्ट-नियुक्त मध्यस्थता के बजाय संस्थागत मध्यस्थता को अपनाना होगा, तभी इसके लाभ समझ में आएंगे।

सम्मेलन में यह भी चर्चा हुई कि अनुबंधों की कठोरता, अधिकारियों की अत्यधिक सतर्कता और विक्रेताओं का अत्यधिक आशावाद भी विवादों की प्रमुख वजहें हैं।

कुल मिलाकर, सम्मेलन में संस्थागत मध्यस्थता को भारतीय व्यापारिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मानते हुए इसे बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।