
नई दिल्ली, 13 फरवरी (पीटीआई) — राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान उनके भाषण के बड़े हिस्से को कार्यवाही से हटाए जाने का मुद्दा उठाया और उसे बहाल करने की मांग की।
शून्यकाल के तुरंत बाद यह मुद्दा उठाते हुए खड़गे ने सभापति से अपने भाषण के कुछ अंश हटाने के निर्णय पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो वे उन अंशों को सार्वजनिक कर देंगे।
हालांकि सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि अध्यक्ष के निर्णय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता और जो कुछ भी कार्यवाही से हटाया गया है, उसे बाहर जारी नहीं किया जा सकता।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी खड़गे पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्ष के नेता के रूप में उन्हें अध्यक्ष के निर्णय पर इस तरह टिप्पणी करना शोभा नहीं देता।
मुद्दा उठाते हुए खड़गे ने सभापति से 4 फरवरी 2026 को धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान दिए गए अपने भाषण के अंशों को बहाल करने की मांग की। उन्होंने कहा, “मैंने सामाजिक न्याय से लेकर संसदीय व्यवस्था तक कई महत्वपूर्ण बिंदु तथ्यों के साथ रखे थे। लेकिन जब मैंने राज्यसभा की वेबसाइट पर अपलोड किए गए अपने भाषण के शब्दशः पाठ की समीक्षा की, तो पाया कि मेरे भाषण का बड़ा हिस्सा बिना किसी उचित कारण के हटा दिया गया है।”
उन्होंने दावा किया कि हटाए गए हिस्सों में वे टिप्पणियां शामिल थीं, जिनमें उन्होंने वर्तमान सरकार के कार्यकाल के दौरान संसदीय कार्यवाही पर तथ्यात्मक टिप्पणियां की थीं और प्रधानमंत्री की कुछ नीतियों की आलोचना की थी, जो कि विपक्ष के नेता के रूप में उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि वे नीतियां भारतीय जनमानस को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही हैं।
अपने पांच दशक लंबे संसदीय अनुभव का हवाला देते हुए खड़गे ने कहा, “मैं सदन की गरिमा, उसके नियमों और परंपराओं तथा पीठासीन अधिकारी के कर्तव्यों से भली-भांति परिचित हूं। मुझे पूरी जानकारी है कि क्या और कहां उठाया जा सकता है।”
उन्होंने कहा कि राज्यसभा की कार्यवाही संचालन नियमावली का नियम 261 केवल विशेष और सीमित परिस्थितियों में लागू होता है, इसलिए उनका भाषण बहाल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि यह स्वीकार करें कि मेरे हटाए गए वक्तव्य में कुछ भी असंसदीय या मानहानिकारक नहीं था और न ही उसने नियम 261 का उल्लंघन किया। जो मैंने कहा, वह चर्चा के विषय से पूरी तरह संबंधित था और धन्यवाद प्रस्ताव के दायरे में था। इसलिए मेरे भाषण के इतने बड़े हिस्से को हटाया जाना संविधान के अनुच्छेद 105(1) के तहत सांसदों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर चिंताएं उत्पन्न करता है और लोकतंत्र के विरुद्ध है।”
उन्होंने सभापति से पुनर्विचार कर हटाए गए अंशों को बहाल करने का अनुरोध किया और कहा, “यदि मुझे आपसे न्याय नहीं मिला, तो मैं हटाए गए हिस्सों को जनता के साथ साझा करने के लिए बाध्य हो जाऊंगा। यह राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मेरा संवैधानिक कर्तव्य है।”
सभापति ने प्रारंभ में कहा, “ठीक है, मैं इस पर विचार करूंगा।”
जब खड़गे ने कहा कि वे अन्यथा हटाए गए हिस्सों को सार्वजनिक कर देंगे, तो सभापति ने कहा, “ऐसा नहीं किया जा सकता। आप वरिष्ठ सदस्य हैं, आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? जो भी हटाया गया है, उसे आप बाहर नहीं कह सकते।”
इस पर खड़गे ने कहा, “सरकार और मोदी जी की नीतियों की आलोचना करना मेरा अधिकार है।” उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके वक्तव्य हटाए जाते हैं, तो यह समझा जाएगा कि सभापति प्रधानमंत्री की रक्षा कर रहे हैं।
इस पर सभापति ने जवाब दिया, “यह सही नहीं है। मैं आपके इस बिंदु से सहमत नहीं हूं। यह लोकतांत्रिक नहीं है। आप अध्यक्ष को निर्देश दे रहे हैं, जो उचित नहीं है।”
इसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण खड़ी हुईं और कहा, “विपक्ष के नेता ने आपके निर्णय पर सवाल उठाया है।”
उन्होंने नियम 261 का हवाला देते हुए कहा, “यदि सभापति की राय में कोई शब्द या शब्दावली मानहानिकारक, अशोभनीय, असंसदीय या गरिमा के विरुद्ध है, तो वे अपने विवेक से उसे कार्यवाही से हटाने का आदेश दे सकते हैं।”
सीतारमण ने आगे कहा, “विपक्ष के नेता यह संकेत दे रहे हैं कि उनके अपने निर्णय के अनुसार उन्होंने कुछ भी अशोभनीय नहीं कहा, जबकि आपने सभापति के रूप में निर्णय लिया है।”
उन्होंने कहा, “उस निर्णय पर दोबारा सवाल उठाना और यह सुझाव देना कि यह प्रधानमंत्री की रक्षा के लिए किया गया है, विपक्ष के नेता के पद के अनुरूप नहीं है। अध्यक्ष को सम्मान दिया जाना चाहिए।”
जब सभापति ने प्रश्नकाल जारी रखने के लिए कहा, तो कांग्रेस सदस्य विरोध करते रहे। हालांकि सभापति ने उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी और कहा, “आप अध्यक्ष पर प्रश्न नहीं उठा सकते।”
