खनन हितों को फायदा पहुंचाने के लिए अरावली को बेचने की साजिश कर रहा है केंद्र: गहलोत

Ashok Gehlot

जयपुर, 23 दिसंबर (पीटीआई) राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार को केंद्र सरकार पर अरावली पहाड़ियों के संरक्षण के नाम पर उन्हें “बेचने” की साजिश रचने का आरोप लगाया और कहा कि खनन हितों को लाभ पहुंचाने के लिए “संस्थागत कब्जे और पर्यावरणीय सुरक्षा को कमजोर करने के प्रयास” किए जा रहे हैं।

गहलोत ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के उस दावे को खारिज किया कि अरावली क्षेत्र के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही खनन की अनुमति दी जाएगी। उन्होंने कहा कि यह दावा भ्रामक है और सच्चाई से कोसों दूर है।

उन्होंने इस वर्ष सरिस्का के संरक्षित दर्जे में बदलाव के प्रयासों को लेकर केंद्र और भाजपा शासित राजस्थान सरकार, दोनों की मंशा पर भी सवाल उठाए।

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत गठित एक समिति की अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों की नई परिभाषा संबंधी सिफारिशों को स्वीकार किया था।

नई परिभाषा के अनुसार, “अरावली पहाड़ी वह कोई भी भू-आकृति है जो नामित अरावली जिलों में स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर स्थित हो” और “अरावली श्रेणी ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों का समूह है जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर हों।”

इस आदेश के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों और राजनीतिक नेताओं का दावा है कि कानूनी संरक्षण के अभाव में देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक की 90 प्रतिशत तक विनाश की आशंका है।

गहलोत ने सोमवार को कहा, “भाजपा चयनित आंकड़ों के जरिए जनता को भ्रमित करने की कोशिश कर रही है। अरावली की नई 100 मीटर वाली परिभाषा को अन्य फैसलों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए, जो संरक्षित क्षेत्रों को खनन माफिया के हवाले करने की योजना की ओर इशारा करते हैं।”

उन्होंने कहा, “केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का यह दावा कि इस नए फैसले के बाद भी अरावली के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही नए खनन की अनुमति दी जाएगी, गलत और भ्रामक है।”

गहलोत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए 2002 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित केंद्रीय सशक्त समिति (सीईसी) को 5 सितंबर 2023 को जारी एक अधिसूचना के जरिए कमजोर कर दिया गया, जिसमें उसे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधीन कर दिया गया।

उन्होंने आरोप लगाया, “पहले सीईसी के सदस्यों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी से होती थी। नई व्यवस्था में केंद्र को सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार दे दिया गया, जिससे समिति निष्प्रभावी हो गई है।”

गहलोत ने बताया कि सीईसी की स्वतंत्र रिपोर्ट के आधार पर ही 2011 में अवैध खनन मामले में कर्नाटक के पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी की सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी हुई थी। उन्होंने कहा कि वही संस्था अब केवल सरकारी फैसलों पर मुहर लगाने तक सीमित कर दी गई है।

सरिस्का टाइगर रिजर्व का जिक्र करते हुए गहलोत ने कहा कि संरक्षित क्षेत्रों के अप्रभावित रहने के दावे “अधूरे” हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस वर्ष राजस्थान सरकार ने सरिस्का में क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट की सीमा के युक्तिकरण का प्रस्ताव रखा, जिससे उन 50 से अधिक संगमरमर और डोलोमाइट खदानों को लाभ मिलता, जिन्हें संरक्षित क्षेत्र के आसपास प्रतिबंधों के कारण बंद किया गया था।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव को “रिकॉर्ड समय” में मंजूरी दिलाई गई—राजस्थान राज्य वन्यजीव बोर्ड ने 24 जून को, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने 25 जून को और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने 26 जून को इसे मंजूरी दे दी।

गहलोत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष 6 अगस्त को इस फैसले पर रोक लगा दी थी और सवाल उठाया था कि जिस प्रक्रिया में आमतौर पर महीनों लगते हैं, वह 48 घंटे के भीतर कैसे पूरी कर ली गई। उन्होंने दावा किया कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों अब भी क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट की सीमाओं में बदलाव की कोशिश कर रही हैं। पीटीआई एसडीए आरयूके आरयूके

श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज़

एसईओ टैग: #स्वदेशी, #न्यूज़, खनन हितों को फायदा पहुंचाने के लिए अरावली को बेचने की साजिश कर रहा है केंद्र: गहलोत