गाजा के लिए ट्रंप के ‘रिविएरा’ विचार का फिलिस्तीन ने किया स्वागत, लेकिन शर्त यही कि इसका लाभ गाजावासियों को मिले: फिलिस्तीनी विदेश मंत्री

President Donald Trump arrives to speak about the economy at a rally Tuesday, Jan. 27, 2026, in Clive, Iowa.AP/PTI(AP01_28_2026_000007B)

नई दिल्ली, 30 जनवरी (पीटीआई) — फिलिस्तीन ने गाजा पट्टी को भूमध्यसागरीय “रिविएरा” में बदलने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विचार का विरोध नहीं किया है, लेकिन यह तभी स्वीकार्य होगा जब ऐसी योजना स्वयं फिलिस्तीनियों के हित में हो और उनकी कीमत पर थोपे जाने वाली न हो। यह बात फिलिस्तीन की विदेश राज्य मंत्री वर्सेन अगाबेकियन शाहीन ने शुक्रवार को कही।

पीटीआई वीडियो को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में भारत की भागीदारी मददगार हो सकती है।

गाजा को मध्य पूर्व का रिविएरा बनाने संबंधी ट्रंप के विचार पर एक सवाल के जवाब में शाहीन ने कहा, “खैर, उसके लोगों के लिए एक रिविएरा—क्यों नहीं? यदि यह गाजावासियों, यानी फिलिस्तीनियों के आनंद के लिए है, तो हां। लेकिन यदि यह दूसरों के लिए हो और फिलिस्तीनियों के बिना, तो नहीं।”

उनकी यह टिप्पणी गाजा के पुनर्निर्माण और ट्रंप द्वारा प्रस्तावित अमेरिका-नेतृत्व वाले ‘पीस बोर्ड’ पर वैश्विक ध्यान बढ़ने के बीच आई है। शांति लाने के किसी भी प्रयास का स्वागत करते हुए शाहीन ने जोर दिया कि गाजा का पुनर्निर्माण फिलिस्तीनी राजनीतिक अधिकारों से अलग नहीं किया जा सकता।

शाहीन भारत- अरब विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए भारत में हैं, जहां उन्होंने कहा कि उनकी चर्चाओं में फिलिस्तीनी मुद्दा “सबसे आगे” रहेगा।

उन्होंने कहा, “शांति स्थापित करने का कोई भी प्रयास स्वागतयोग्य है क्योंकि यह दशकों की हिंसा के बाद उम्मीद देता है।”

लेकिन उन्होंने जोड़ा, “हम चाहते हैं कि यह योजना किसी बड़े लक्ष्य से जुड़ी हो—एक ऐसा स्पष्ट रास्ता, जो फिलिस्तीनी स्वतंत्रता की ओर ले जाए।”

भारत को भी प्रस्तावित पीस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है, लेकिन उसने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। शाहीन ने कहा कि नई दिल्ली की भागीदारी सहायक हो सकती है, लेकिन शांति प्रक्रिया के परिणाम स्पष्ट रूप से परिभाषित होने चाहिए।

उन्होंने कहा, “यदि रास्ता और अंतिम परिणाम स्पष्ट हों, तो यह हमारे उद्देश्य में मदद करेगा,” और दोहराया कि भारत लगातार दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है।

इज़राइल द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद पीस बोर्ड में पाकिस्तान को शामिल किए जाने के सवाल पर शाहीन ने कहा कि कोई भी देश प्रक्रिया को निर्देशित नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा, “इज़राइल को यह तय करना बंद करना चाहिए कि दुनिया के लिए क्या स्वीकार्य है। जो स्वीकार्य है, वही है जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप हो।”

जमीनी हालात का जिक्र करते हुए शाहीन ने कहा कि आंशिक संघर्षविराम के बावजूद गाजा अब भी अस्थिर है।

उन्होंने कहा, “पिछले दो वर्षों जैसी अत्याचार की घटनाएं हम नहीं देख रहे हैं, लेकिन संघर्षविराम नाजुक है। केवल स्थायी और टिकाऊ संघर्षविराम ही लोगों को राहत देगा और पुनर्निर्माण की शुरुआत संभव बनाएगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि गाजा के पुनर्निर्माण के लिए निरंतर अंतरराष्ट्रीय समर्थन की आवश्यकता होगी।

हमास के बारे में शाहीन ने कहा कि समूह को शांति ढांचे के हिस्से के रूप में हथियार डालने चाहिए, बशर्ते वह इसे स्वीकार करे। उन्होंने भारत के संतुलित दृष्टिकोण का स्वागत करते हुए कहा कि इज़राइल और फिलिस्तीन—दोनों के साथ नई दिल्ली के संबंध उसे एक रचनात्मक भूमिका निभाने में सक्षम बनाते हैं।

अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के मुद्दे पर उन्होंने चेतावनी दी कि इससे गाजा की नाजुक शांति प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने कहा, “क्षेत्र में कोई भी अस्थिरता सभी को प्रभावित करती है, जिसमें फिलिस्तीन भी शामिल है। संघर्षों का समाधान हथियारों से नहीं, बल्कि बातचीत की मेज पर होना चाहिए।”

पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) की स्थिति पर बोलते हुए शाहीन ने कहा कि गाजा पर ध्यान केंद्रित रहने के बावजूद वहां हालात लगातार बिगड़ रहे हैं।

उन्होंने कहा, “अवैध बसने वाले हिंसा फैला रहे हैं और रोज़ाना फिलिस्तीनी जीवन को आतंकित कर रहे हैं। हम एक ऐसे रंगभेद (अपार्थाइड) व्यवस्था के तहत रह रहे हैं जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती है,” और उन अनेक संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का उल्लेख किया जिन्हें इज़राइल ने अभी तक लागू नहीं किया है।

ट्रंप के प्रति फिलिस्तीनियों की भावना के बारे में पूछे जाने पर शाहीन ने कहा कि यदि फिलिस्तीनी अधिकारों का सम्मान किया जाए तो यह विश्वास है कि वे शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं।

उन्होंने कहा, “शांति का मतलब दोनों लोगों का सम्मान करना है, न कि एक की कीमत पर दूसरे का।”

उन्होंने जोड़ा, “अंतरराष्ट्रीय कानून में निहित अपने राज्य का फिलिस्तीनियों को अधिकार है। अब समय आ गया है कि उन्हें इसे साकार करने में मदद दी जाए।”

भारत ने अभी तक ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने पर निर्णय नहीं लिया है। समझा जाता है कि यह पहल संवेदनशील मुद्दों से जुड़ी होने के कारण नई दिल्ली विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है।

भारत इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति और सुरक्षा के साथ सह-अस्तित्व वाले “दो-राष्ट्र समाधान” की वकालत करता रहा है।

जिन देशों ने ट्रंप के निमंत्रण को स्वीकार कर बोर्ड में शामिल होने पर सहमति जताई है, उनमें अर्जेंटीना, अल्बानिया, आर्मेनिया, अज़रबैजान, बहरीन, बेलारूस, बुल्गारिया, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कज़ाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, मंगोलिया, पाकिस्तान, क़तर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं।

पीटीआई SHJ MPB ZMN