जलवायु वित्त ‘निर्णायक मुद्दा’, 2070 तक भारत को चाहिए 10 ट्रिलियन डॉलर: भूपेंद्र यादव

New Delhi: Union Minister and BJP leader Bhupender Yadav addresses a press conference at the party headquarters, in New Delhi, Friday, Aug. 8, 2025. (PTI Photo/Salman Ali)(PTI08_08_2025_000118B)

नई दिल्ली, 11 सितम्बर (पीटीआई) — केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुरुवार को कहा कि जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) “जलवायु कार्रवाई के लिए निर्णायक मुद्दा” है और विकसित देशों की “नैतिक जिम्मेदारी” है कि वे वैश्विक दक्षिण (Global South) को कम-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने में सहयोग दें।

उद्योग मंडल फिक्की (FICCI) द्वारा आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यादव ने कहा कि भारत को अपने नेट-जीरो लक्ष्य को 2070 तक हासिल करने के लिए 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की आवश्यकता होगी। उन्होंने वैश्विक वित्तीय तंत्र से निजी पूंजी को सक्रिय करने और साथ ही पारदर्शिता, जवाबदेही और सुलभता सुनिश्चित करने की अपील की।

उन्होंने कहा, “सार्वजनिक धन इस समस्या के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। राजकोषीय स्थान सीमित है। सार्वजनिक बजट और रियायती वित्त का उद्देश्य जोखिम कम करना, निजी पूंजी को आकर्षित करना और नियम तय करना है।”

यादव ने कहा कि जलवायु वित्त ही असल में विकास वित्त है।

“स्वच्छ ऊर्जा, कुशल शहर, जलवायु-स्मार्ट कृषि और मजबूत अवसंरचना अतिरिक्त नहीं हैं; बल्कि यही ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा की नींव हैं।”

उन्होंने भारत की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स में निवेशकों का भरोसा मजबूत है, आरबीआई और सेबी जैसे नियामक पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित कर रहे हैं, और मिश्रित वित्तीय तंत्र से नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, वेस्ट-टू-वेल्थ और प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने “महत्त्वाकांक्षा, नवाचार और रूपांतरण” का रास्ता चुना है। उन्होंने देश के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार कार्यक्रम, जीवंत स्टार्टअप इकोसिस्टम और नवाचार के लिए तैयार युवा एवं कुशल जनसंख्या का उल्लेख किया।

यादव ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के उपयोग का जोरदार समर्थन किया और कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सक्षम बनाता है तथा विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग का द्वार खोल सकता है।

उन्होंने समझाया कि अनुच्छेद 6 के तहत देश संयुक्त राष्ट्र द्वारा निगरानी की जाने वाली व्यवस्था और द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से कार्बन क्रेडिट का व्यापार कर सकते हैं। उनके अनुसार, उच्च-ईमानदारी वाले कार्बन बाजार अरबों डॉलर को जलवायु कार्रवाई में लगा सकते हैं जो अन्यथा संभव नहीं होता।

यादव ने चेतावनी दी कि पर्याप्त वित्त जुटाने में विफलता का अर्थ होगा कि “हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को जलवायु अनिश्चितता, संसाधनों की कमी और पर्यावरणीय क्षरण के भविष्य में धकेल देंगे।”

उन्होंने बताया कि भारत का ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम निजी पूंजी को पर्यावरणीय पुनर्स्थापन में लगा रहा है और आरबीआई के अनुसार भारत को 2030 तक उद्योगों को जलवायु मानकों के अनुरूप बनाने के लिए लगभग ₹85.6 लाख करोड़ खर्च करने होंगे।

यादव ने कहा, “ग्रीन फाइनेंस कोई विशेष विषय नहीं है, बल्कि यह मजबूत और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं की रीढ़ है।” उन्होंने यह भी कहा कि फिनटेक, डिजिटल प्लेटफॉर्म और एआई ग्रीन फाइनेंस को पारदर्शी, कुशल और बड़े पैमाने पर लागू कर सकते हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ग्रीन फाइनेंस को “लोगों को केंद्र में” रखना चाहिए — यानी गरिमापूर्ण रोजगार सृजित करना, कमजोरों की सुरक्षा करना और एमएसएमई, किसानों और वंचित समूहों तक पहुंच सुनिश्चित करना।

यादव ने कहा, “अगर हम अपने हरित संक्रमण का वित्तपोषण करने में विफल रहते हैं, तो यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी से विफल होना होगा। यह मान लेना होगा कि हमारी पीढ़ी की सुविधा उनकी पीढ़ियों के अस्तित्व से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है — जो भारतीय मूल्यों और सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।”

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