
टोक्यो, 25 जनवरी (एपी) जापान में पांडा प्रेमी रविवार को टोक्यो के उएनो चिड़ियाघर में आख़िरी सार्वजनिक दर्शन के लिए जुटे, इससे पहले कि जुड़वां पांडा शाओ शाओ और लेई लेई इस सप्ताह चीन लौट जाएं।
मंगलवार को उनकी विदाई के साथ ही जापान में पहली बार पिछले लगभग 50 वर्षों में कोई भी पांडा नहीं रहेगा। टोक्यो और बीजिंग के बीच संबंध हाल के वर्षों में सबसे निचले स्तर पर होने के कारण नए पांडा मिलने की संभावना भी बेहद कम मानी जा रही है।
चीन ने 1972 में पहली बार जापान को पांडा भेजे थे, जो दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के सामान्यीकरण का प्रतीक थे। काले-सफेद रंग के ये प्यारे भालू तुरंत ही जापानी जनता के दिलों में बस गए और तब से अब तक दर्जनभर पांडा राष्ट्रीय सेलिब्रिटी बन चुके हैं।
उएनो चिड़ियाघर ने पांडा ज़ोन में प्रति दर्शक केवल एक मिनट का समय तय किया था, इसके बावजूद जुड़वां पांडाओं को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ी। कई लोग पांडा-थीम वाले खिलौने लिए हुए थे, नाम पुकारते हुए और स्मार्टफोन से तस्वीरें लेते नज़र आए, जब शाओ शाओ और लेई लेई बांस खाते और इधर-उधर घूमते दिखे। जिन्हें टिकट नहीं मिल सके, वे भी आख़िरी दिन को यादगार बनाने के लिए चिड़ियाघर पहुंचे।
लंबे समय से पांडा प्रेमी मिचिको सेकी ने कहा कि वह जुड़वां पांडाओं को स्वस्थ और अच्छे से खाते देखकर खुश हैं। उन्होंने वही कैमरा इस्तेमाल किया, जिसे उन्होंने दो साल पहले जापान छोड़ चुकी बड़ी बहन शियान शियान की तस्वीरें लेने के लिए खरीदा था।
सेकी ने कहा, “मैं नहीं चाहती कि पांडा कूटनीतिक विवाद में फंसें। ये ऐसे जानवर हैं जो लोगों को बहुत सुकून देते हैं। जापान को पांडा चाहिए, और मुझे उम्मीद है कि नेता कोई रास्ता निकालेंगे।”
चीन पांडा अन्य देशों को उधार देता है, लेकिन उनका स्वामित्व अपने पास रखता है, यहां तक कि विदेश में पैदा हुए शावकों का भी। शाओ शाओ और लेई लेई का जन्म 2021 में उएनो चिड़ियाघर में हुआ था।
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने जापान को नए पांडा भेजने के सवाल पर कहा, “मुझे पता है कि जापान में विशाल पांडा बहुत पसंद किए जाते हैं और हम जापानी मित्रों का चीन आकर उन्हें देखने के लिए स्वागत करते हैं।”
पांडा के लिए जीने वाला एक प्रशंसक
वेब इंजीनियर ताकाहिरो ताकाउजी का जीवन पांडाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। 15 साल पहले उएनो चिड़ियाघर में पांडाओं के माता-पिता शिन शिन और री री को देखने के बाद से वह उनके दीवाने हो गए।
“उनका आकार और चलने का तरीका बेहद प्यारा और मज़ेदार है,” उन्होंने कहा। वह अब तक पांडाओं की एक करोड़ से ज़्यादा तस्वीरें ले चुके हैं और कई फोटो बुक प्रकाशित कर चुके हैं।
अंतिम दर्शन के दौरान, एक मिनट में ताकाउजी ने कैमरा ऊपर उठाकर करीब 5,000 तस्वीरें लीं। घर लौटकर, पांडा खिलौनों और सजावट से भरे कमरे में उन्होंने तस्वीरें अपने ब्लॉग “एवरी डे पांडा” पर अपलोड कीं।
“मैंने कभी सोचा नहीं था कि जापान से पांडा पूरी तरह चले जाएंगे,” उन्होंने कहा।
टोक्यो-बीजिंग संबंधों में तनाव
जापान और चीन के बीच राजनीतिक, व्यापारिक और सुरक्षा संबंधों में तनाव बढ़ा है। ताइवान को लेकर हालिया बयानों ने भी विवाद को हवा दी है। पूर्वी चीन सागर में क्षेत्रीय विवाद और चीन के बढ़ते प्रभाव ने रिश्तों को और जटिल बना दिया है।
जापान के शीर्ष सरकारी प्रवक्ता मिनोरू किहारा ने बताया कि चोंगछिंग स्थित जापानी वाणिज्य दूतावास में एक महीने से कौंसल की नियुक्ति नहीं हो पाई है, क्योंकि चीन ने नए नाम को मंज़ूरी नहीं दी।
पांडा कूटनीति का इतिहास
विशाल पांडा चीन के लिए सद्भावना और संरक्षण का प्रतीक रहे हैं। 1972 में उएनो पहुंचे पहले पांडा कांग कांग और लान लान के बाद कई देशों—अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी—को भी पांडा मिले। 1980 के दशक से चीन ने उपहार की जगह लीज़ प्रणाली अपनाई।
जापान में पांडा केवल जानवर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक हैं। उएनो क्षेत्र में पांडा की तस्वीरें कुकीज़, खिलौनों, स्टेशनरी और मूर्तियों पर दिखती हैं।
उएनो के एक स्मृति-चिन्ह दुकान प्रबंधक असाओ एज़ुरे ने कहा, “पांडा उएनो की पहचान हैं। उनकी अनुपस्थिति का असर हमें चिंता में डालता है।”
अर्थशास्त्री कात्सुहिरो मियामोतो के अनुसार, पांडा न होने से हर साल लगभग 20 अरब येन (करीब 128 मिलियन डॉलर) का आर्थिक नुकसान हो सकता है।
उन्होंने कहा, “अगर यह स्थिति कई साल रही, तो नुकसान और बढ़ेगा। पांडा-प्रेमी जापानियों की तरह मैं भी उम्मीद करता हूं कि वे जल्द लौटें।”
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