जिम्मेदारी सावधानी से न निभाई जाए तो अदालत की प्रक्रिया ही सज़ा बन सकती है: सुप्रीम कोर्ट

New Delhi: People gather outside the Supreme Court, in New Delhi, Monday, Jan. 5, 2026. Supreme Court on Monday refused to grant bail to activists Umar Khalid and Sharjeel Imam in the 2020 Delhi riots conspiracy matter, saying there was a prima facie case against them under the Unlawful Activities (Prevention) Act. (PTI Photo/Atul Yadav)(PTI01_05_2026_000065B)

नई दिल्ली, 11 फरवरी (पीटीआई) सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून के शासन के प्रति निष्ठा यह मांग करती है कि अदालत यह याद रखे कि यदि जिम्मेदारी सावधानीपूर्वक नहीं निभाई गई तो न्यायिक प्रक्रिया स्वयं ही सज़ा बन सकती है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश के व्यापम (VYAPAM) परीक्षा घोटाले के व्हिसलब्लोअर के खिलाफ जाति-आधारित हिंसा के आरोपों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।

आनंद राय ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 2022 की एक रैली के दौरान एक सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कथित हिंसा और दुर्व्यवहार से जुड़े जाति-आधारित अत्याचार के मामले में आरोप तय करने के फैसले को बरकरार रखा गया था।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने राय के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अदालत को सचेत रूप से यह अंतर करना चाहिए कि कौन-सा मामला वास्तव में सुनवाई योग्य है और कौन-सा केवल संदेह, अनुमान या बिना किसी ठोस आधार पर टिका है।

शीर्ष अदालत ने कहा, “यदि प्रथम दृष्टया मामला न होने के बावजूद किसी प्रकरण को आगे बढ़ने दिया जाता है, तो यह किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से आपराधिक कार्यवाही के तनाव, कलंक और अनिश्चितता के हवाले करना है। कानून के शासन के प्रति निष्ठा यह अपेक्षा करती है कि अदालत याद रखे कि यदि इस जिम्मेदारी का सावधानी से निर्वहन नहीं किया गया, तो प्रक्रिया ही सज़ा बन सकती है।”

मंगलवार को सुनाया गया और बुधवार को अपलोड किए गए फैसले में कहा गया कि आरोप तय करने या आरोपमुक्ति पर विचार के चरण में अदालत कोई अमूर्त कानूनी अभ्यास नहीं कर रही होती।

अदालत ने कहा, “यह वास्तविक लोगों, उनकी वास्तविक चिंताओं और आपराधिक मुकदमे की वास्तविक गंभीरता से जुड़ा होता है। इस चरण पर न्यायिक जिम्मेदारी सावधानी, संतुलन और अभिलेख पर उपलब्ध तथ्यों के साथ ईमानदार जुड़ाव की मांग करती है। आरोप तय करने की शक्ति का प्रयोग केवल औपचारिकता या अत्यधिक सतर्कता के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि जब अदालत के समक्ष प्रस्तुत सामग्री, प्रथम दृष्टया, किसी अपराध के तत्वों को प्रकट नहीं करती, तो कानून अपेक्षा करता है कि अदालत में यह स्पष्टता और साहस हो कि वह ऐसा कहे और ऐसे मामले को अलग रखे।

अदालत ने कहा, “यह जिम्मेदारी सबसे अधिक ट्रायल कोर्ट पर होती है, जो अधिकांश लोगों के लिए न्यायपालिका से पहला संपर्क होता है। किसी वादी या आरोपी के लिए ट्रायल कोर्ट केवल न्यायिक श्रेणी का एक स्तर नहीं है, बल्कि वह स्वयं न्यायपालिका का चेहरा है।”

अदालत ने आगे कहा, “इस स्तर पर दिखाई गई संवेदनशीलता, निष्पक्षता और कानूनी अनुशासन ही आम नागरिकों की न्याय के प्रति समझ को आकार देता है। ट्रायल कोर्ट का तथ्यों और कानून के प्रति दृष्टिकोण अक्सर पूरे न्यायिक तंत्र की छवि बन जाता है। इसलिए प्रत्येक चरण पर, विशेषकर प्रारंभिक स्तर पर, ट्रायल कोर्ट को अपने निर्णयों के मानवीय प्रभाव और समाज द्वारा उस पर रखे गए विश्वास के प्रति सजग रहना चाहिए।”

मामले पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोप स्थापित करने के लिए कई आवश्यक तत्वों का होना अनिवार्य है।

पीठ ने कहा कि इस अधिनियम के तहत यह साबित होना चाहिए कि आरोपी को यह जानकारी थी कि पीड़ित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है, या संबंधित संपत्ति ऐसे व्यक्ति की है।

अदालत ने कहा, “जब ट्रायल कोर्ट स्वयं स्वीकार करता है कि धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयानों में कहीं भी आरोपी द्वारा कथित रूप से अपमान, धमकी या हत्या की नीयत से कहे गए विशिष्ट जातिसूचक शब्दों का उल्लेख नहीं है, तो उसी साक्ष्य के आधार पर यह कैसे निष्कर्ष निकाला गया कि आरोपी की कथित हरकतें जातिगत जानकारी से प्रेरित थीं।”

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई अन्य साक्ष्य भी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी को पीड़ित की जाति की जानकारी थी। “जब आरोपी की जानकारी ही संदिग्ध है, तो यह स्पष्ट है कि आरोप टिक नहीं सकते।”

पीठ ने कहा कि आश्चर्यजनक रूप से हाईकोर्ट का 18 पन्नों का निर्णय एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोपों पर कोई विश्लेषण नहीं करता और केवल यह कहता है कि ट्रायल कोर्ट ने ‘विस्तृत कारण’ दिए हैं।

अदालत ने कहा, “जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है, वे कारण अपर्याप्त और असंतोषजनक हैं। केवल इस आधार पर कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के सतही विश्लेषण से आईपीसी की कुछ धाराएं लागू होती प्रतीत होती हैं, एससी/एसटी अधिनियम की धाराएं भी जोड़ दी गईं।” अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता के एससी/एसटी समुदाय से होने का कोई स्पष्ट उल्लेख भी नहीं है।

पीठ ने एससी/एसटी अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को निरस्त कर दिया और मामले को अन्य आरोपों पर कानून के अनुसार आगे बढ़ाने के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अधिवक्ता सुमीर सोढ़ी ने मध्य प्रदेश के नेत्र रोग विशेषज्ञ और व्यापम घोटाले के व्हिसलब्लोअर आनंद राय की ओर से पैरवी की।

यह घटना 15 नवंबर, 2022 को मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के धराड़ गांव में भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम के दौरान हुई थी।

आरोप था कि राय ने एक सांसद, विधायक, कलेक्टर और अन्य अधिकारियों के वाहनों को रोका। विकास पारगी नामक व्यक्ति द्वारा दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि एक समूह ने लगभग एक घंटे तक सड़क जाम रखी, जनप्रतिनिधियों को गाली दी और रास्ता साफ करने की कोशिश कर रहे पुलिसकर्मियों से झड़प की। PTI MNL ZMN