वॉशिंगटन, 22 जनवरी (एपी) — अपने राष्ट्रपति पद के मुश्किल से एक महीने बाद, जो बाइडन ने यूरोप को एक संदेश दिया था।
“अमेरिका वापस आ गया है,” बाइडन ने 2021 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कहा था। “ट्रांसअटलांटिक गठबंधन वापस आ गया है।”
यह वादा बाइडन बार-बार दोहराते रहे, ताकि अपने पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप के दौर की उथल-पुथल को एक अस्थायी अपवाद के रूप में पेश कर सकें। लेकिन लगभग पांच साल बाद, बाइडन के ये आश्वासन अल्पकालिक साबित हुए हैं।
अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने यूरोप के साथ पिछले सात दशकों में बने गठबंधनों को दरकिनार कर दिया है, जिनकी बदौलत जर्मनी का पुनः एकीकरण और सोवियत संघ का पतन संभव हुआ था। उन्होंने यूरोपीय नेताओं को कठोर शब्दों में घेरा, मांगें रखीं और ऐसे आरोप लगाए जो आमतौर पर दुश्मनों से जुड़े होते हैं। इससे उन रिश्तों की स्थिरता हिल गई है और कई देशों को अमेरिकी नेतृत्व के बिना अपनी राह तय करनी पड़ रही है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी रही। उन्होंने इस क्षेत्र को “बर्फ का बड़ा टुकड़ा” बताते हुए डेनमार्क से अमेरिका को सौंपने की मांग की — ऐसा कदम नाटो को तोड़ सकता था।
उन्होंने अफगानिस्तान में गठबंधन बलों में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति मौतें झेलने वाले डेनमार्क को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सुरक्षा के लिए “अकृतज्ञ” कहा। ट्रंप ने निजी संदेश पोस्ट किए जिनमें यूरोपीय नेता उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने ग्रीनलैंड में अमेरिकी झंडा गाड़ते हुए अपनी तस्वीरें साझा कीं और दावोस में विश्व आर्थिक मंच में कहा कि यूरोप “सही दिशा में नहीं जा रहा।” एक मौके पर उन्होंने कहा कि “कभी-कभी आपको एक तानाशाह की जरूरत होती है।”
कुछ घंटों बाद उन्होंने आर्कटिक सुरक्षा पर “भविष्य के समझौते के ढांचे” की घोषणा की, लेकिन हमेशा की तरह इसके बारे में बहुत कम विवरण दिया।
दुनिया में अमेरिका की अनिश्चित स्थिति
हालांकि ट्रंप ने फिलहाल ग्रीनलैंड को लेकर अपनी सबसे कड़ी धमकियों से कदम पीछे खींच लिया है, लेकिन इस प्रकरण ने दुनिया में अमेरिका की स्थिति को अनिश्चित बना दिया है।
नाटो के नेता पहले ही ऐसे विकल्पों पर संकेत देने लगे हैं जिनमें अमेरिका शामिल न हो। इससे भविष्य के किसी भी राष्ट्रपति — चाहे डेमोक्रेट हों या रिपब्लिकन — के लिए वही भरोसा बहाल करना बेहद कठिन हो सकता है, जैसा बाइडन ने करने की कोशिश की थी।
बाइडन के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन फाइनर ने कहा,
“कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं, लेकिन वे कभी पहले जैसे नहीं होंगे, क्योंकि कोई भी समझदार देश अब यह मानकर चलेगा कि अमेरिका पर अधिकतम चार साल तक ही भरोसा किया जा सकता है।”
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, जिन्होंने ट्रंप के कनाडा को 51वां राज्य बनाने के सुझाव का विरोध किया, पहले ही अधिक स्वतंत्र राह पर निकल चुके हैं। दावोस में उन्होंने कहा कि नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था एक “भ्रम” थी।
“हम किसी संक्रमण नहीं, बल्कि एक टूटन के दौर में हैं,” उन्होंने कहा और मध्यम शक्तियों से एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया।
ट्रंप से टैरिफ घटाने का समझौता न हो पाने पर कार्नी पिछले हफ्ते बीजिंग गए, जहां उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलकर ऐसा समझौता किया, जिससे चीनी इलेक्ट्रिक कारों पर शुल्क घटे और बदले में कनाडाई कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम हों। वहां उन्होंने कहा कि वाशिंगटन के साथ रिश्ते “काफी जटिल” हैं, लेकिन चीन के साथ हालिया संबंध “ज्यादा अनुमानित” रहे हैं।
इधर, यूरोपीय संघ और दक्षिण अमेरिका के मर्कोसुर समूह ने लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लायन ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ एक ढाल बताया। हालांकि, ईयू सांसदों ने फिलहाल इस सौदे को रोक दिया है।
यूरोपीय नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
दावोस में ट्रंप के भाषण से पहले यूरोपीय नेताओं ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया — जो हाल तक अमेरिका के लिए अकल्पनीय था।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने औपनिवेशिक रोमांच से सावधान किया और कहा कि दुनिया “नियमों के बिना” दिशा में बढ़ रही है।
बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर ने कहा,
“बहुत सारी लाल रेखाएं पार हो चुकी हैं। खुश गुलाम बनना एक बात है, दुखी गुलाम बनना दूसरी। अगर अब झुक गए, तो अपनी गरिमा खो देंगे।”
ब्रिटेन में निगेल फराज ने कहा कि ग्रीनलैंड पर ट्रंप का रवैया ट्रांसअटलांटिक रिश्तों में दशकों की सबसे बड़ी दरार है।
उन्होंने कहा, “ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी देना एक बहुत ही शत्रुतापूर्ण कदम है।”
फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता जॉर्डन बारडेला ने ट्रंप की धमकियों को “व्यावसायिक ब्लैकमेल” बताते हुए अमेरिका के साथ टैरिफ समझौता निलंबित करने की मांग की।
अमेरिका के भीतर की प्रतिक्रिया
कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी का अधिकांश हिस्सा ट्रंप के साथ खड़ा है या चुप है।
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के अध्यक्ष ब्रायन मास्ट ने इसे “कठिन बातचीत” बताया।
हालांकि, कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने असहमति जताई। नेब्रास्का के सांसद डॉन बेकन ने कहा,
“ग्रीनलैंड को बलपूर्वक लेने की धमकी पूरी तरह अनावश्यक और बेतुकी थी।”
डेमोक्रेट नेताओं ने ज्यादा सख्त प्रतिक्रिया की मांग की। कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने कहा,
“डोनाल्ड ट्रंप के साथ कूटनीति? वह टी-रेक्स हैं — या तो आप उनसे मिलेंगे, या वे आपको निगल जाएंगे।”
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि भविष्य के किसी राष्ट्रपति को भरोसा बहाल करने में “काफी समय” लगेगा।
“मित्र देश तब तक सांस रोके रहेंगे जब तक अमेरिका में लगातार दो ऐसे चुनाव न हो जाएं, जिनसे उन्हें यकीन हो कि अगला राष्ट्रपति संस्थानों के साथ खड़ा रहेगा,” उन्होंने कहा।
(एपी) एसकेएस
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