
जिनेवा, 29 दिसंबर (एपी) — अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा विदेशी सहायता में लगातार कटौती किए जाने और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों को “अनुकूलन करें, सिमटें या समाप्त हो जाएं” की चेतावनी दिए जाने के बीच, अमेरिका ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता के लिए 2 अरब डॉलर देने का ऐलान किया।
यह राशि अतीत में अमेरिका द्वारा दी गई सहायता की तुलना में काफी कम है, लेकिन प्रशासन का मानना है कि यह एक उदार योगदान है, जिससे अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय दाता बना रहेगा।
इस घोषणा के तहत एक साझा (अम्ब्रेला) फंड बनाया जाएगा, जिसके जरिए विभिन्न एजेंसियों और प्राथमिकताओं को धनराशि दी जाएगी। यह व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में व्यापक बदलाव की अमेरिकी मांगों का अहम हिस्सा है, जिसने कई मानवीय कार्यकर्ताओं को चिंतित किया है और कार्यक्रमों व सेवाओं में भारी कटौती करवाई है।
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, यह 2 अरब डॉलर उस पारंपरिक अमेरिकी मानवीय फंडिंग का केवल एक छोटा हिस्सा है, जो हाल के वर्षों में सालाना 17 अरब डॉलर तक रही है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इसमें से केवल 8 से 10 अरब डॉलर स्वैच्छिक योगदान थे। इसके अलावा, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता से जुड़ी वार्षिक फीस के रूप में भी अरबों डॉलर देता है।
आलोचकों का कहना है कि पश्चिमी देशों की सहायता में कटौती दूरदर्शिता से रहित है, जिससे लाखों लोग भुखमरी, विस्थापन और बीमारियों की ओर धकेले गए हैं और दुनिया भर में अमेरिका की ‘सॉफ्ट पावर’ को नुकसान पहुंचा है।
सहायता में संकट का एक साल
यह कदम शरणार्थी, प्रवासन और खाद्य सहायता से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों के लिए संकटपूर्ण वर्ष का संकेत देता है। ट्रंप प्रशासन पहले ही अरबों डॉलर की विदेशी सहायता में कटौती कर चुका है, जिसके चलते इन एजेंसियों को खर्च घटाने, परियोजनाएं बंद करने और हजारों नौकरियां खत्म करने पर मजबूर होना पड़ा है। अन्य पारंपरिक पश्चिमी दाताओं ने भी सहायता राशि घटाई है।
संयुक्त राष्ट्र मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) के साथ हुए प्रारंभिक समझौते के तहत यह अमेरिकी सहायता दी जाएगी। इस कार्यालय का नेतृत्व टॉम फ्लेचर कर रहे हैं, जो ब्रिटेन के पूर्व राजनयिक और सरकारी अधिकारी हैं।
एक ओर जहां अमेरिका सहायता में कटौती कर रहा है, वहीं दुनिया भर में जरूरतें बढ़ती जा रही हैं। इस वर्ष संघर्षग्रस्त सूडान और गाजा के कुछ हिस्सों में अकाल दर्ज किया गया है। वहीं, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी मानी जा रही बाढ़, सूखा और प्राकृतिक आपदाओं ने कई लोगों की जान ली है और हजारों को बेघर किया है।
इस कटौती का असर अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन, विश्व खाद्य कार्यक्रम और शरणार्थी एजेंसी यूएनएचसीआर जैसी संस्थाओं पर पड़ेगा। इन्हें इस साल अमेरिका से अरबों डॉलर कम मिले हैं, जो न केवल पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल से कम हैं, बल्कि ट्रंप के पहले कार्यकाल से भी कम हैं।
अब योजना यह है कि फ्लेचर का कार्यालय — जिसने पिछले साल खर्च की दक्षता, जवाबदेही और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए “ह्यूमैनिटेरियन रीसेट” शुरू किया था — अमेरिकी और अन्य देशों की सहायता को एक माध्यम से संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाए, बजाय इसके कि अमेरिका अलग-अलग अपीलों के जरिए धन देता रहे।
सहायता के एकीकरण पर जोर
अमेरिकी विदेश विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की सहायता वितरण प्रणाली में “और अधिक केंद्रीकृत नेतृत्व अधिकार” देखना चाहता है।
अधिकारी के अनुसार, इस योजना के तहत फ्लेचर और उनका कार्यालय यह तय करेंगे कि पैसा किस एजेंसी को और कैसे दिया जाए।
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइकल वॉल्ट्ज ने कहा, “संयुक्त राष्ट्र में यह मानवीय रीसेट कम करदाताओं के पैसे में अधिक सहायता पहुंचाने में मदद करेगा और अमेरिकी विदेश नीति के अनुरूप परिणाम-आधारित सहायता सुनिश्चित करेगा।”
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि 2 अरब डॉलर केवल शुरुआत है, ताकि ओसीएचए की वार्षिक सहायता अपील को पूरा किया जा सके। बदलते वैश्विक हालात को देखते हुए फ्लेचर ने इस साल सहायता की मांग पहले ही घटा दी है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे पारंपरिक दाताओं ने भी इस वर्ष सहायता में कटौती की है और सुधारों की मांग की है।
विदेश विभाग ने एक बयान में कहा, “इस समझौते के तहत संयुक्त राष्ट्र को मानवीय कार्यों का एकीकरण करना होगा, ताकि नौकरशाही खर्च, अनावश्यक दोहराव और वैचारिक विस्तार को कम किया जा सके। व्यक्तिगत एजेंसियों को अनुकूलन करना होगा, सिमटना होगा या समाप्त होना होगा।”
बयान में आगे कहा गया, “मानवीय एजेंसियां संयुक्त राष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण कार्य करती हैं, इसलिए सुधार कहीं भी सबसे ज्यादा जरूरी हैं। आज का समझौता इन सुधार प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
इस योजना के तहत धनराशि के ऐसे पूल बनाए जाएंगे, जिन्हें जरूरत के हिसाब से किसी विशेष संकट या देश को दिया जा सकेगा। शुरुआत में 17 देशों को लक्षित किया जाएगा, जिनमें बांग्लादेश, कांगो, हैती, सीरिया और यूक्रेन शामिल हैं।
हालांकि, दुनिया के सबसे संकटग्रस्त देशों में से एक अफगानिस्तान को इसमें शामिल नहीं किया गया है। न ही फिलिस्तीनी क्षेत्रों को, जिन्हें अधिकारियों के अनुसार ट्रंप की अभी अधूरी गाजा शांति योजना से मिलने वाले धन से कवर किया जाएगा।
कई महीनों से तैयार हो रही यह परियोजना ट्रंप के उस लंबे समय से चले आ रहे नजरिए से जुड़ी है, जिसमें वह मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में बड़ी संभावनाएं हैं, लेकिन यह अपने मूल उद्देश्य — जीवन बचाने — से भटक गया है और अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाते हुए कट्टर विचारधाराओं को बढ़ावा और गैर-जवाबदेह खर्च को प्रोत्साहित कर रहा है।
टॉम फ्लेचर ने इस समझौते की सराहना करते हुए कहा, “वैश्विक संकट के इस दौर में अमेरिका यह दिखा रहा है कि वह एक मानवीय महाशक्ति है, जो उन लोगों को उम्मीद दे रहा है जिन्होंने सब कुछ खो दिया है।”
(एपी)
