दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई द्वारा इंटरसेप्ट की गई कॉल और संदेशों के ट्रांसक्रिप्ट नष्ट करने की याचिका खारिज की

नई दिल्ली, 8 जुलाई (पीटीआई) — दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई द्वारा कथित रूप से अवैध रूप से इंटरसेप्ट की गई कॉल और संदेशों के ट्रांसक्रिप्ट को नष्ट करने की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने देश की अर्थव्यवस्था पर भ्रष्टाचार के “व्यापक प्रभाव” को रेखांकित करते हुए यह फैसला सुनाया।

न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 26 जून को यह आदेश पारित किया, जिसमें आरोपी आकाश दीप चौहान द्वारा दायर उस याचिका को भी खारिज कर दिया गया जिसमें निचली अदालत द्वारा आईपीसी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक साजिश के आरोप तय करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि यह इंटरसेप्शन कानूनी था, क्योंकि गृह मंत्रालय द्वारा जारी आदेश “सार्वजनिक सुरक्षा” और “सार्वजनिक व्यवस्था” के हित में, अपराध को भड़काने से रोकने के लिए पारित किए गए थे।

आदेश में कहा गया, “भ्रष्टाचार से उत्पन्न खतरे को कम करके नहीं आंका जा सकता। भ्रष्टाचार का देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता है और यह बुनियादी ढांचे के विकास से लेकर संसाधनों के आवंटन तक, हर चीज को प्रभावित कर सकता है।” अदालत ने आगे कहा कि किसी लोक सेवक द्वारा किया गया भ्रष्टाचार न केवल सार्वजनिक विश्वास को कमजोर करता है और संस्थाओं की साख पर सवाल उठाता है, बल्कि देश की आर्थिक सुरक्षा को भी खतरे में डालता है।

सीबीआई ने आरोप लगाया था कि एम/एस शापूरजी पलोनजी एंड कंपनी (प्रा.) लिमिटेड द्वारा एम/एस कैपेसाइट स्ट्रक्चर्स लिमिटेड को स्टील वर्क का सब-कॉन्ट्रैक्ट दिलाने के लिए साजिश रची गई थी। इसमें एक लोक सेवक प्रदीप ने एनबीसीसी के वरिष्ठ अधिकारियों पर प्रभाव डालने के लिए अवैध रूप से एक नई मोटरसाइकिल की मांग की थी। यह मांग आरोपी रिशभ ने, जो बिचौलिये की भूमिका में था, आरोपी संजय (कैपेसाइट स्ट्रक्चर्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक) को बताई थी। चौहान, जो संजय के कर्मचारी थे, ने कथित तौर पर रिश्वत के तौर पर देने के लिए मोटरसाइकिल खरीदी थी।

चौहान ने अपनी याचिका में दलील दी कि सीबीआई द्वारा की गई इंटरसेप्शन अवैध और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, इसलिए ये सबूत स्वीकार्य नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई की जांच में सामने आए साक्ष्य उनके खिलाफ गंभीर संदेह नहीं बनाते। सीबीआई ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इंटरसेप्टेड कॉल्स को नष्ट करना जरूरी नहीं है और भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम के तहत सार्वजनिक सुरक्षा की शर्त इस मामले में पूरी होती है। सीबीआई ने कहा कि चौहान के खिलाफ आरोप भ्रष्टाचार से जुड़े हैं, जो देश और जनता की आर्थिक भलाई के लिए खतरा है।

अदालत ने कहा कि हालांकि प्रत्येक व्यक्ति को निजता का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत इसे सीमित किया जा सकता है। केंद्र या राज्य सरकार या कोई अधिकृत अधिकारी किसी भी सार्वजनिक आपातकाल या सार्वजनिक सुरक्षा के हित में कानूनी रूप से इंटरसेप्शन या निगरानी कर सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि वर्तमान मामले में लगाए गए गंभीर आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह पूरी निविदा प्रक्रिया और टेंडर आवंटन को संदेह के घेरे में डाल देगा, जहां व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर फैसले लिए गए, न कि जनहित में। इसी आधार पर कोर्ट ने ट्रांसक्रिप्ट नष्ट करने की मांग को खारिज कर दिया।

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