
नई दिल्ली, 8 जनवरी (पीटीआई)
दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रीय राजधानी के निजी स्कूलों को शुल्क नियमन समितियां (Fee Regulation Committees) गठित करने के निर्देश देने वाली अधिसूचना पर रोक लगाने से इंकार कर दिया, लेकिन ऐसी समितियों के गठन के लिए समय बढ़ा दिया।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय (DoE) और उपराज्यपाल को नोटिस जारी किया और दिल्ली स्कूल एजुकेशन (Transparency in Fixation and Regulation of Fees) अधिनियम, 2025 और उसके नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने को कहा।
याचिकाओं में 24 दिसंबर, 2025 की DoE की अधिसूचना को भी चुनौती दी गई थी, जिसमें स्कूल-स्तरीय शुल्क नियमन समिति (SLFRC) के गठन और उसके संचालन के लिए दिशा-निर्देश दिए गए थे। यह अधिनियम और उसके नियम शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए लागू हैं।
कोर्ट ने अधिसूचना पर रोक लगाने से इंकार करते हुए समितियों के गठन की समयसीमा 10 जनवरी से बढ़ाकर 20 जनवरी कर दी। इसके अलावा, स्कूल प्रबंधन द्वारा समितियों को प्रस्तुत किए जाने वाले शुल्क प्रस्ताव की अंतिम तिथि 25 जनवरी से बढ़ाकर 5 फरवरी कर दी गई।
पीठ ने कहा, “इस बीच, 24 दिसंबर, 2025 की DoE, GNCTD द्वारा जारी अधिसूचना के तहत की जाने वाली कोई भी कार्यवाही इन याचिकाओं में आगे दिए जाने वाले आदेशों के अधीन होगी।”
नए ढांचे के तहत हर निजी स्कूल को SLFRC गठित करनी होगी। इस समिति में स्कूल प्रबंधन के प्रतिनिधि, प्रधानाचार्य, तीन शिक्षक, पांच अभिभावक और DoE का एक नामित सदस्य शामिल होंगे। सदस्यों का चयन पारदर्शिता बनाए रखने के लिए पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा।
SLFRC स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रस्तुत शुल्क प्रस्तावों की समीक्षा करेगी और 30 दिनों के भीतर निर्णय लेगी।
यह कदम निजी स्कूलों के शुल्क निर्धारण में पारदर्शिता लाने और उसे नियंत्रित करने के लिए नए कानून के कार्यान्वयन का प्रतीक है। अधिनियम दो स्तर की व्यवस्था के माध्यम से लागू होगा, जिसमें स्कूल-स्तरीय समितियां और जिला-स्तरीय अपीलीय निकाय शामिल हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, जो याचिकाकर्ताओं — Action Committee Unaided Recognised Private Schools — का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, ने कहा कि उन्होंने नए अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है और कोर्ट से अधिसूचना पर रोक लगाने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि इस तरह का आदेश या अधिसूचना केवल उपराज्यपाल द्वारा जारी किया जा सकता है, जबकि यहां इसे DoE ने जारी किया है। उन्होंने तर्क दिया कि या तो अधिसूचना पर रोक लगाई जाए या स्कूलों के खिलाफ कोई बाध्यकारी कार्रवाई न की जाए।
DoE का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एस.वी. राजू ने कहा कि निदेशालय भी यह अधिसूचना जारी कर सकता है। DoE अधिकारियों से निर्देश प्राप्त करने के बाद उन्होंने कोर्ट की सलाह अनुसार अधिसूचना का पालन करने की समयसीमा बढ़ाने पर सहमति जताई।
याचिका में कहा गया कि ये कानून दिल्ली के निजी स्कूल प्रबंधन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और बिना विचार किए, मनमाने, पक्षपाती और दुर्भावनापूर्ण तरीके से बनाए गए हैं।
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