बेंगलुरु, कर्नाटक, भारत (न्यूज़वॉयर) — राष्ट्रीय सांस्कृतिक पिथियन खेल 2025 का समापन आज शाम बेंगलुरु सिटी यूनिवर्सिटी के बेस कैंप (पुश स्पोर्ट्स) में हुआ। तीन दिनों तक परिसर एक उत्सव स्थल की तरह जीवंत रहा। छात्र मंचों के आसपास जुटे रहे, कलाकार कोनों में अपनी प्रस्तुतियों का अभ्यास करते रहे और दर्शक विभिन्न प्रदर्शनों के बीच घूमते रहे। 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए 2,000 से अधिक प्रतिभागियों ने नृत्य, संगीत और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं के माध्यम से इस महोत्सव में भाग लिया।
भारत में पिथियन खेलों के पुनरुद्धार का नेतृत्व इंटरनेशनल पिथियन गेम्स के संस्थापक श्री बिजेंद्र गोयल कर रहे हैं, जो कला और खेल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक साझा मंच देने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। समापन समारोह में उन्होंने बेंगलुरु संस्करण को भारत की व्यापक सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा, “पिथियन आंदोलन सीमाएँ नहीं, पुल बनाता है।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 2026 में रूस के सहयोग से युवा पिथियन खेलों का आयोजन किया जाएगा और 2027 में भारत पहली बार अंतरराष्ट्रीय पिथियन खेलों की मेजबानी करेगा।
इस वर्ष का एक विशेष आकर्षण राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित पारंपरिक खेल ‘पिट्टू’ (सात पत्थर) प्रतियोगिता रही। यह एक ऐसा बचपन का खेल है जिसे देखकर दर्शकों के चेहरों पर तुरंत पहचान और मुस्कान आ गई। खेल के दौरान माहौल में जोश और उत्साह भर गया और लोग पूरे दिल से खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते रहे। लड़कों की श्रेणी में मध्य प्रदेश ने स्वर्ण और रजत दोनों पदक जीते जबकि ओडिशा को कांस्य मिला। लड़कियों की श्रेणी में भी मध्य प्रदेश ने स्वर्ण पदक जीता, ओडिशा ने रजत और राजस्थान ने कांस्य पदक हासिल किया। इस दौरान श्री बिजेंद्र गोयल, श्रीमती ललिता गोयल, श्री बी. एच. अनिल कुमार (अध्यक्ष) और श्रीमती स्नेहा वेंकटारमणि (आयोजन सचिव) ने भी खेल में भाग लेकर पत्थरों के ढेर को गिराने का प्रयास किया। दर्शकों ने तालियों और हंसी से उनका स्वागत किया, यह दर्शाते हुए कि सांस्कृतिक स्मृतियाँ सिर्फ मंचीय कला में ही नहीं बल्कि उन सादे खेलों में भी जीवित रहती हैं जो कभी स्कूलों और गलियों में खेले जाते थे।
अंतिम दिन विभिन्न श्रेणियों में प्रस्तुतियाँ और पुरस्कार वितरण हुए। सब-जूनियर डांस सोलो वर्ग में दिल्ली की पविका कुमार ने स्वर्ण पदक जीता, जो उनके लिए लगातार तीसरी जीत रही। कर्नाटक की माया कृष्णा ने रजत और कर्नाटक की निकिता एस तथा ताश्या बी.के ने कांस्य पदक साझा किया। जूनियर ग्रुप डांस श्रेणी में कर्नाटक की लया ध्वनि अकादमी ने स्वर्ण, उत्तराखंड की शेफील्ड स्टार्स ने रजत और कर्नाटक के हर्षित नाइक ग्रुप ने कांस्य पदक जीता। मंच पर भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कूर्गी पारंपरिक नृत्य और उत्तराखंड की लोक प्रस्तुतियाँ हुईं, जिनमें हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट लय और शैली झलक रही थी।
सांबो कुश्ती प्रतियोगिताओं में भी रोमांच देखने को मिला। लड़कों (18–20 वर्ष, 71 किग्रा) वर्ग में तमिलनाडु के बी. श्री काली सरन ने स्वर्ण और कर्नाटक के ए. एम. ओमकार ने रजत पदक जीता। लड़कों (24 वर्ष से कम, 58 किग्रा) वर्ग में आंध्र प्रदेश के आर. बालाजी नाइक ने स्वर्ण और तमिलनाडु के किशोर कुमार ने रजत पदक प्राप्त किया। लड़कियों (14–16 वर्ष, 44 किग्रा) वर्ग में तमिलनाडु की पी. श्री धरनिशा ने स्वर्ण और आंध्र प्रदेश की एस. सना ने रजत जीता, जबकि लड़कियों (8–9 वर्ष, 34 किग्रा) वर्ग में तमिलनाडु की एस. निथिला और ए. रिया श्री ने क्रमशः स्वर्ण और रजत पदक हासिल किए।
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्री बी. एच. अनिल कुमार ने समापन समारोह में कहा, “द्वितीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक पिथियन खेलों के समापन पर मैं सभी प्रतिभागियों, कलाकारों और आयोजकों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। इन दिनों हमने भारत की सांस्कृतिक प्रतिभा और सृजनशीलता को उसके सबसे शुद्ध रूप में देखा है। रचनात्मकता, एकता और उत्कृष्टता की यह भावना हमारे भीतर लंबे समय तक प्रेरणा देती रहेगी।” कर्नाटक कुश्ती संघ के अध्यक्ष श्री गुणारंजन शेट्टी ने भी समारोह में भाग लिया और प्रतिभागियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि कर्नाटक की परंपरा हमेशा से कला और खेल दोनों को समान महत्व देने की रही है।
इस महोत्सव का आयोजन श्री बी. एच. अनिल कुमार (अध्यक्ष), श्री शंतनु अग्रहरी, आईएएस (अध्यक्ष, पीसीआई), श्रीमती स्नेहा वेंकटारमणि (आयोजन सचिव) और श्री एस. शिवा कुमार (महासचिव) के नेतृत्व में किया गया। उनकी टीम ने यह सुनिश्चित किया कि कार्यक्रम सुचारू रूप से चले और सभी कलाकारों तथा आगंतुकों को आवश्यक सहयोग मिले।
आयोजन के समापन के साथ ही बेंगलुरु ने एक बार फिर यह साबित किया कि यह वह शहर है जहां परंपरागत संस्कृति और आधुनिक अभिव्यक्ति एक साथ सांस लेती हैं। पिथियन खेल यह संदेश छोड़ गए हैं कि परंपराएं तब तक जीवित रहती हैं जब तक उन्हें साझा किया जाता है, अभ्यास में लाया जाता है और नई पीढ़ियों को सौंपा जाता है।
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