“द बंगाल फाइल्स” पर भावुक हुए अनुपम खेर

**EDS: THIRD PARTY IMAGE** In this image released by PIB on May 2, 2025, Bollywood actor Anupam Kher speaks during a session ‘Pan-Indian Cinema: Myth or Momentum?’ at the World Audio Visual and Entertainment Summit (WAVES) 2025, in Mumbai. (PIB via PTI Photo) (PTI05_02_2025_000220B) *** Local Caption ***

वयोवृद्ध अभिनेता अनुपम खेर, जो विवेक अग्निहोत्री की विवादास्पद हिंदी राजनीतिक ड्रामा द बंगाल फाइल्स में मोहनदास करमचंद गांधी की भूमिका निभा रहे हैं, ने फिल्म को भरे हुए थिएटर में देखने के बाद X (ट्विटर) पर अपना गहरा भावनात्मक अनुभव साझा किया। उन्होंने इस अनुभव को “झकझोर देने वाला,” “दुखद,” “भावनात्मक रूप से परेशान करने वाला,” और कई बार “सुन्न कर देने वाला” बताया।

भरे हुए थिएटर, भावुक प्रतिक्रियाएँ

खेर ने लिखा कि शो लगभग 80% भरा हुआ था और दर्शकों में हर आयु वर्ग के लोग मौजूद थे। कई लोग गहराई से प्रभावित हुए, कुछ तो दंगों के पीड़ितों के लिए रो भी पड़े। अभिनेता ने फिल्म के सभी विभागों—अभिनय, प्रोडक्शन डिज़ाइन, छायांकन, बैकग्राउंड स्कोर और कॉस्ट्यूम्स—को “ए-ग्रेड” कहा। उन्होंने निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को “जहाज़ के कैप्टन” की संज्ञा दी और दर्शकों से फिल्म देखने की अपील की।

रिलीज़ और राजनीतिक अड़चनें

द बंगाल फाइल्स 5 सितंबर 2025 को पूरे देश में रिलीज़ हुई। फिल्म डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखली दंगों की भयावह घटनाओं पर आधारित है और इन्हें योजनाबद्ध नरसंहार के रूप में प्रस्तुत करती है, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास से बाहर रखा गया। हालांकि फिल्म पूरे देश में लगी है, लेकिन पश्चिम बंगाल में सिनेमाघरों ने इसे दिखाने से इनकार कर दिया है।

निर्माता-अभिनेत्री पल्लवी जोशी ने इसे लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखा और चिंता जताई। इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IMPPA) ने भी इसे “अनौपचारिक प्रतिबंध” बताया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की।

भूली-बिसरी त्रासदी से सामना

विवेक अग्निहोत्री द्वारा लिखित और निर्देशित यह फिल्म केवल ऐतिहासिक विवरण नहीं बल्कि मुख्यधारा की चुप्पियों को चुनौती देती है। निर्देशक का उद्देश्य मनोरंजन से आगे बढ़कर चिंतन, पहचान और इतिहास की पीड़ाओं से उपचार की प्रक्रिया शुरू करना है।

महत्व और निहितार्थ

अनुपम खेर की स्पष्ट प्रतिक्रिया बताती है कि द बंगाल फाइल्स भावनात्मक स्तर पर दर्शकों को गहराई से छूती है। गांधी की भूमिका निभाते हुए हिंसा और बंटवारे के बीच उनका नजरिया और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

लेकिन पश्चिम बंगाल में इसका विरोध यह सवाल खड़ा करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीति और इतिहास की प्रस्तुति के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।

अंतिम शब्द

जैसे-जैसे द बंगाल फाइल्स भावनात्मक और राजनीतिक बहस को जन्म दे रही है, यह साफ है कि सिनेमा समाज की स्मृतियों और संवाद को गढ़ने की शक्ति रखता है। चाहे कोई राजनीतिक संदेश से सहमत हो या नहीं, फिल्म ने अपना मकसद पूरा कर लिया है—चिंतन, बहस और इतिहास की सच्चाई की तलाश को आगे बढ़ाना।