
मुंबई, 8 फरवरी (पीटीआई)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि धार्मिक रूपांतरण, घुसपैठ और कम जन्म दर जनसंख्या असंतुलन के तीन मुख्य कारण हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि “एक परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए”, हालांकि यह पूरी तरह से व्यक्तिगत पसंद का विषय है।
उन्होंने बल, प्रलोभन या धोखे के जरिए लोगों का धर्म परिवर्तन कर किसी संप्रदाय की संख्या बढ़ाने की कड़ी निंदा की और कहा कि जो लोग अपने मूल धर्म में लौटना चाहते हैं, उनके लिए “घर वापसी” ही समाधान है।
घुसपैठ से जुड़े सवाल पर भागवत ने कहा कि आरएसएस कार्यकर्ता भाषा के आधार पर संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान करते हैं और इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को देते हैं।
भागवत यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शताब्दी के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में उपस्थित लोगों के साथ संवाद सत्र के दौरान सवालों के जवाब दे रहे थे।
जनसंख्या असंतुलन पर उन्होंने कहा, “इसके तीन प्रमुख कारण हैं। पहला कारण धार्मिक रूपांतरण है। हालांकि आस्था की स्वतंत्रता सुनिश्चित है, लेकिन बल, प्रलोभन या धोखे से लोगों का धर्म परिवर्तन कर किसी संप्रदाय की संख्या बढ़ाना पूरी तरह निंदनीय है।”
उन्होंने कवि नारायण वामन तिलक का उदाहरण देते हुए आस्था की स्वतंत्रता की बात कही और दोहराया कि अपने मूल धर्म में लौटने के इच्छुक लोगों के लिए “घर वापसी” ही रास्ता है।
“जो वापस आना चाहते हैं, उनके लिए हम रास्ता बनाते हैं,” उन्होंने कहा।
भागवत ने कहा कि दूसरा कारण घुसपैठ है, जिसके लिए सरकार को व्यापक स्तर पर काम करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि पहचान और निर्वासन की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू हो चुकी है और इसमें तेजी आएगी। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभ्यास का उल्लेख किया, जिसके तहत कुछ लोगों को गैर-नागरिक के रूप में चिन्हित कर मतदाता सूची से हटाया गया है।
“आरएसएस कार्यकर्ता भी भाषा के आधार पर संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान कर अधिकारियों को सूचना देते हैं,” उन्होंने कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकों, जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं, को रोजगार मिलेगा, लेकिन विदेशियों को नहीं।
उन्होंने कहा कि जनसंख्या असंतुलन का तीसरा कारण कम जन्म दर है।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि डॉक्टरों की सलाह है कि 19 से 25 वर्ष की आयु के बीच विवाह और तीन बच्चों का होना माता-पिता और बच्चों दोनों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, जबकि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि तीन बच्चे भाई-बहनों के बीच अहंकार से जुड़ी समस्याओं को संभालने में मदद करते हैं और दीर्घकाल में पारिवारिक स्थिरता सुनिश्चित करते हैं।
भागवत ने कहा कि जनसंख्या वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि जब प्रजनन दर 2.3 से नीचे चली जाती है तो जनसंख्या खतरे में पड़ जाती है और उस स्तर पर देश को गिरावट की स्थिति में माना जाता है।
“हम अब 2.1 से नीचे जा रहे हैं और केवल बिहार जैसे राज्यों के कारण स्थिति संभली हुई है,” उन्होंने कहा और जोड़ा कि कई देशों ने जनसंख्या में गिरावट को पलटने के लिए कदम उठाए हैं।
भारत की जनसंख्या नीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि 2.1 की निर्धारित प्रजनन दर को गोल करने पर प्रभावी रूप से इसका अर्थ तीन बच्चे होता है।
“सभी प्रकार के वैज्ञानिक शोध अब यह संकेत देते हैं कि एक परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए,” उन्होंने कहा, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह पुरुषों, महिलाओं और परिवारों की व्यक्तिगत पसंद का विषय है और इसे व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
उन्होंने अंग्रेज़ी पुस्तक ‘चीपर बाय द डजन’ का हवाला देते हुए कहा कि यह दर्शाती है कि कई बच्चों का पालन-पोषण कोई बड़ी समस्या नहीं है।
उन्होंने लेखक के अमेरिका में 12 बच्चों के पालन-पोषण के व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तक यह तर्क देती है कि अधिक बच्चे होना किफायती भी हो सकता है, और इसी पर एक फिल्म भी बनी है।
भागवत ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों के बीच शारीरिक संबंध नहीं है, बल्कि यह परिवार बनाने की संस्था है, जो समाज का हिस्सा होती है।
“ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई जिम्मेदारी लिए बिना विवाह करे,” उन्होंने कहा। उन्होंने जोड़ा कि हालांकि अविवाहित रहना आरएसएस स्वयंसेवकों की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है, लेकिन पारिवारिक जीवन में कर्तव्य और संबंधों का निर्वहन जरूरी है।
घुसपैठ पर बोलते हुए उन्होंने दोहराया कि आरएसएस कार्यकर्ता भाषा के आधार पर संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान कर अधिकारियों को सूचित करते हैं। उन्होंने कहा कि सतर्कता जरूरी है और यह भी कहा कि हिंदू समाज उच्च वेतन की तलाश में पारंपरिक या साधारण नौकरियों से दूर चला गया है, जिससे घुसपैठियों को ऐसे काम करने की जगह मिल गई है।
“हम किसी की नौकरी नहीं छीनना चाहते, लेकिन हमारे लोगों को पहले रोजगार मिलना चाहिए,” उन्होंने कहा और जोड़ा कि स्थानीय स्तर पर रोजगार में उन नागरिकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो स्वयं को हिंदू न भी मानते हों।
रोजगार और तकनीक के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत की आबादी बड़ी है और ऐसे तकनीकी समाधानों की जरूरत है जो अधिक रोजगार पैदा करें।
उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का विरोध न करते हुए कहा कि इसका उपयोग रोजगार सृजन के लिए होना चाहिए।
भागवत ने ‘जनता द्वारा उत्पादन’ की वकालत की, न कि केवल ‘बड़े पैमाने पर उत्पादन’ की।
उन्होंने कहा कि रोजगार की कमी सामाजिक अशांति को जन्म दे सकती है और खाली दिमाग नक्सलवाद, शहरी हिंसा और महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की ओर ले जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आर्थिक स्वास्थ्य का अपूर्ण पैमाना है क्योंकि यह केवल ठोस और मापी जा सकने वाली गतिविधियों को ही दर्शाता है।
महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू कार्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे योगदान जीडीपी में नहीं दिखते।
उन्होंने मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों तरह के उत्पादन की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि जीडीपी आंकड़ों की परवाह किए बिना रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत होगा।
बांग्लादेश में हिंदू आबादी का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि एकजुटता से वे स्थानीय राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
“बांग्लादेश के हिंदुओं ने पलायन करने के बजाय एकजुट होकर विरोध करना चुना है,” उन्होंने कहा और जोड़ा कि आरएसएस अपनी सीमित क्षमता में उनके हित में हरसंभव प्रयास करेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि देश को तोड़ने की कोशिश करने वाली शक्तियां स्वयं बिखर जाएंगी और भारत ऐसे प्रयासों का शिकार नहीं बनेगा।
2047 तक देश के विभाजन से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा, “लोगों को तब तक ‘अखंड भारत’ की कल्पना करनी चाहिए।”
(पीटीआई)
