प्रयागराज, 2 मार्च (पीटीआई) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि न्यायिक कार्य करते समय एक न्यायिक अधिकारी जिला मजिस्ट्रेट, जिला पुलिस प्रमुख और यहां तक कि राज्य के राजनीतिक प्रमुख से भी ऊपर होता है, और ऐसे अधिकारी के आदेश की अवहेलना “अक्षम्य” है।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार की अनदेखी केवल न्यायालय की अवमानना नहीं बल्कि कानून के अधिकार को सीधी चुनौती है।
19 फरवरी के आदेश में न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), ललितपुर के निर्देशों की कथित अनदेखी करने पर पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई और थाना प्रभारी (एसएचओ) तथा विवेचक (आईओ) को अवमानना का दोषी ठहराया।
एकल न्यायाधीश ने उन्हें शाम 4 बजे अदालत उठने तक न्यायालय कक्ष में हिरासत में रहने की सजा सुनाई।
अदालत सानू उर्फ राशिद द्वारा दायर जमानत अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें एक धोखाधड़ी मामले में नामजद किया गया था और कथित रूप से 14 सितंबर 2025 को बिना औपचारिक गिरफ्तारी के हिरासत में ले लिया गया था।
16 सितंबर को उसकी बहन ने सीजेएम, ललितपुर के समक्ष आवेदन दायर कर आरोप लगाया कि उसके भाई को हिरासत में लिया गया लेकिन उसकी गिरफ्तारी दर्ज नहीं की गई। उसने उसी दिन अग्रिम जमानत याचिका भी दायर की, जिसे 18 सितंबर को खारिज कर दिया गया, जब जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) ने अदालत को बताया कि आवेदक को 17 सितंबर की सुबह गिरफ्तार कर लिया गया था।
मामले को गंभीरता से लेते हुए सीजेएम ने 22 सितंबर, 30 सितंबर और 3 नवंबर 2025 को आदेश पारित कर एसएचओ और आईओ को कथित अवैध हिरासत की संबंधित तिथियों की पुलिस स्टेशन की सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
हालांकि, फुटेज प्रस्तुत नहीं की गई। सीजेएम ने यह भी स्पष्टीकरण मांगा कि सह-आरोपी महिला राशिदा को सुबह 4 बजे क्यों गिरफ्तार किया गया, जबकि कानून में विशेष परिस्थितियों को छोड़कर सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले किसी महिला की गिरफ्तारी पर रोक है।
अवमानना की कार्यवाही की चेतावनी के बावजूद पुलिस अधिकारियों ने न तो कोई रिपोर्ट प्रस्तुत की और न ही सीसीटीवी फुटेज दी।
जब मामला 4 फरवरी 2026 को उच्च न्यायालय के समक्ष आया, तो उसने संबंधित आईओ और एसएचओ को तलब किया। वे 18 फरवरी को उपस्थित हुए और बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा कि सीसीटीवी की भंडारण क्षमता 10 टेराबाइट तक सीमित थी और दो महीने बाद फुटेज स्वतः मिट जाती थी। उन्होंने अनुपालन न करने को “अनजाने में हुई चूक” बताया।
इस स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति देशवाल ने कहा कि अधिकारियों ने जानबूझकर सीजेएम के आदेशों का पालन नहीं किया और कहा कि “अदालत न्यायिक निर्देशों के अनुपालन न होने पर आंखें बंद नहीं कर सकती।”
अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश के कई पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों का अनुचित रखरखाव “एक सामान्य प्रवृत्ति” बन गया है, जिससे कथित रूप से अवैध हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।
न्यायपालिका की भूमिका पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि न्यायाधीश संप्रभु राज्य के कार्यों का निर्वहन करते हैं और उन्हें प्रशासनिक या कार्यपालिका अधिकारियों के समान नहीं माना जा सकता जो केवल राजनीतिक कार्यपालिका के निर्णयों को लागू करते हैं।
“जब एक न्यायिक अधिकारी अपना न्यायिक कार्य कर रहा होता है, तो वह जिला मजिस्ट्रेट या जिला पुलिस प्रमुख और यहां तक कि राज्य के राजनीतिक प्रमुख से भी ऊपर होता है,” उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की।
न्यायालय ने न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए सीजेएम के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना के लिए दोनों अधिकारियों को अवमानना का दोषी पाया। हालांकि, दंड की मात्रा के संबंध में नरमी बरतते हुए उन्हें दिन भर के लिए अदालत उठने तक न्यायालय कक्ष में हिरासत में रहने की सजा दी।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आवेदक को कथित रूप से तीन दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और उसके परिवार को सूचित नहीं किया गया, जो डी के बसु मामले में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।
अदालत ने राज्य सरकार को आवेदक को एक लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया और संबंधित पुलिसकर्मियों के वेतन से यह राशि वसूलने की अनुमति दी।
इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि सभी जिलों में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या संबंधित मजिस्ट्रेट अपने आधिकारिक कर्तव्य के तहत, जिला न्यायाधीश को पूर्व सूचना देकर, न्यायालय समय के बाद अपने अधिकार क्षेत्र के पुलिस थानों का औचक निरीक्षण करें ताकि सीसीटीवी कैमरों की कार्यप्रणाली की पुष्टि की जा सके।
अदालत ने कहा कि ऐसे निरीक्षण के दौरान सभी पुलिस अधिकारियों को सहयोग करना होगा और किसी भी न्यायिक अधिकारी के प्रति बाधा या अनादर को सख्ती से निपटाया जाएगा।
आखिरकार आवेदक को जमानत दे दी गई जब उसने 15 दिनों के भीतर प्रथम सूचना दाता की वित्त कंपनी को 15 लाख रुपये स्थानांतरित करने का वचन दिया। पीटीआई सीओआर राज किस रुक रुक
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