पति-पत्नी के बीच गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई बातचीत वैवाहिक मामलों में सबूत के तौर पर मान्य: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, 14 जुलाई (पीटीआई) — सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया कि पति-पत्नी के बीच “गुप्त रूप से” रिकॉर्ड की गई बातचीत को वैवाहिक विवादों, जैसे तलाक की कार्यवाही में, साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें निजता के अधिकार का हवाला देते हुए ऐसी रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के तौर पर नकार दिया गया था।

कोर्ट ने कहा कि ऐसा तर्क स्वीकार्य नहीं है कि इस तरह के सबूत वैवाहिक संबंधों में अविश्वास और घरेलू शांति को खतरे में डाल सकते हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “यदि विवाह इस स्तर पर पहुंच गया है कि पति-पत्नी एक-दूसरे की जासूसी कर रहे हैं, तो यह अपने आप में संबंध टूटने और विश्वास की कमी का संकेत है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच संचार की गोपनीयता (प्राइवेसी) होती है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं है और इसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 में दिए गए अपवाद के आलोक में पढ़ा जाना चाहिए।

पीठ ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल करते हुए कहा कि रिकॉर्ड की गई बातचीत को वैवाहिक मामलों में साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

क्या था मामला?

एक दंपति के बीच वैवाहिक विवाद में पति ने तलाक की अर्जी दी थी और अपनी पत्नी के साथ 2010 से 2016 के बीच रिकॉर्ड की गई बातचीत (मेमोरी कार्ड, सीडी, ट्रांसक्रिप्ट) कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर पेश की थी।

फैमिली कोर्ट ने इन साक्ष्यों को स्वीकार कर लिया था, लेकिन पत्नी ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने निजता के अधिकार का हवाला देते हुए इन साक्ष्यों को खारिज कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए कहा कि वैवाहिक मुकदमों में गोपनीयता का अधिकार पूर्ण नहीं है और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के सामने यह झुकता है।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क

कोर्ट ने कहा कि जब विवाह पूरी तरह से टूट चुका हो और एक पक्ष कानूनी उपाय चाहता हो, तो उसे महत्वपूर्ण साक्ष्य पेश करने से वंचित करना न्याय से इनकार करने जैसा होगा।

धारा 122 (साक्ष्य अधिनियम) के तहत पति-पत्नी के बीच की बातचीत को गोपनीय माना गया है, लेकिन यह पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार (अनुच्छेद 21) के संदर्भ में, ऐसे मामलों में गोपनीयता के अधिकार को सीमित किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि “गोपनीयता का अधिकार” और “निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार” में संतुलन जरूरी है। यदि विवाह संबंध पूरी तरह टूट चुका है, तो निष्पक्ष सुनवाई के लिए ऐसे साक्ष्य पेश किए जा सकते हैं।

(PTI SJK AMK)

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