
नई दिल्ली, 14 सितंबर (भाषा) यह कहते हुए कि पांडुलिपियां “भविष्य के लिए मार्गदर्शक प्रकाश” हैं, विद्वानों, शोधकर्ताओं और अन्य विशेषज्ञों के एक बड़े सम्मेलन ने शनिवार को नई दिल्ली घोषणा पत्र को अपनाया ताकि उनके संरक्षण, डिजिटलीकरण और ज्ञान प्रसार के प्रयासों को मजबूत किया जा सके तथा मूल कृतियों को वापस लाया जा सके।
यह घोषणा पत्र यहां विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय वैश्विक सम्मेलन ‘ज्ञान भारतम’ के समापन पर अपनाया गया। इसमें यह संकल्प लिया गया कि “विदेश से मूल पांडुलिपियों का अधिग्रहण और पुनर्प्राप्ति की जाए अथवा उनकी डिजिटल प्रतियां हासिल की जाएं, ताकि शोध और राष्ट्रीय गौरव के लिए इन तक पहुंच सुनिश्चित हो सके।”
संस्कृति मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस घोषणा पत्र को विद्वानों, शोधकर्ताओं और अन्य विशेषज्ञों की बड़ी सभा की उपस्थिति में पढ़कर सुनाया। इसमें कहा गया कि पांडुलिपियां “राष्ट्र की जीवंत स्मृति और उसकी सभ्यतागत पहचान की नींव” हैं।
भारत के पास विश्व की सबसे समृद्ध प्राचीन पांडुलिपियों का संग्रह है, जिसमें लगभग एक करोड़ ग्रंथ शामिल हैं जो देश के पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर को समेटे हुए हैं।
“हम इस विशाल खजाने को संरक्षित करने, डिजिटाइज़ करने और प्रसारित करने का संकल्प लेते हैं। हमारा दृढ़ विश्वास है कि पांडुलिपियां केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि भविष्य का मार्गदर्शन करने वाली प्रकाशपुंज हैं,” इसमें कहा गया।
तीन दिनों तक आठ कार्य समूहों के अंतर्गत हुई तकनीकी बैठकों के बाद यह घोषणा पत्र अपनाया गया।
इसमें कहा गया, “हम पांडुलिपि संरक्षकों…लिपि विशेषज्ञों… तथा भारत की पांडुलिपि धरोहर की परवाह करने वाले सभी लोग, गहन विचार-विमर्श और अनुभूति के बाद यह घोषणा करते हैं कि भारत विश्व की सबसे समृद्ध और विविधतापूर्ण पांडुलिपि धरोहर का देश है, जिसमें दर्शन, विज्ञान, साहित्य, कला, अध्यात्म और अनेक विषयों का सहस्राब्दियों का ज्ञान समाहित है।”
ये पांडुलिपियां ताड़पत्र, भोजपत्र, कपड़े, हस्तनिर्मित कागज़ और अन्य माध्यमों पर अंकित हैं, और “राष्ट्र की जीवित स्मृति तथा उसकी सभ्यतागत पहचान की नींव” का प्रतिनिधित्व करती हैं।
‘विकसित भारत 2047’ की भावना में, हम ‘ज्ञान भारतम’ आंदोलन से जुड़ने और इस विशाल खजाने को संरक्षित, डिजिटाइज़ और प्रसारित करने का संकल्प लेते हैं, ताकि यह नागरिकों और विद्वानों के लिए दुनिया भर में सुलभ हो सके।”
संस्कृति मंत्रालय के अधीन सरकार ने ज्ञान भारतम मिशन की शुरुआत की है। इसका उद्देश्य है देशभर में शैक्षणिक संस्थानों, संग्रहालयों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में स्थित एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण, संरक्षण, डिजिटलीकरण और उपलब्ध कराना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था, “ज्ञान भारतम मिशन भारत की संस्कृति, साहित्य और चेतना की उद्घोषणा बनने जा रहा है।”
उन्होंने यह भी कहा कि विश्व के कई देशों में भारत की प्राचीन पांडुलिपियां संरक्षित हैं और भारत इस साझा मानव धरोहर को एकजुट करने का प्रयास करेगा।
सम्मेलन का उद्देश्य भारत में प्राचीन पांडुलिपियों के सभी संरक्षकों का “गठबंधन” बनाना और उनके संरक्षण एवं ज्ञान-वितरण के लिए देशव्यापी तंत्र तैयार करना है।
घोषणा पत्र में कहा गया है, “हम दृढ़ विश्वास रखते हैं कि पांडुलिपियां केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की मार्गदर्शक हैं, जो धरोहर को नवाचार से, परंपरा को तकनीक से और ज्ञान को विकास से जोड़ती हैं।”
इसमें आगे यह संकल्प लिया गया कि “पांडुलिपियों पर व्यवस्थित अनुसंधान और पुनर्व्याख्या की जाएगी”; और “विदेश से मूल पांडुलिपियों का अधिग्रहण एवं पुनर्प्राप्ति की जाएगी या उनकी डिजिटल प्रतियां हासिल की जाएंगी, ताकि शोध और राष्ट्रीय गौरव के लिए उनका उपयोग हो सके।”
आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि यह केवल घोषणा पत्र में निहित एक दृष्टि है और इसे साकार करने के लिए कानूनी और अन्य ढांचों के अंतर्गत काफी काम करना होगा, जैसे विदेश में संरक्षित किसी अभिलेख की डिजिटल प्रति प्राप्त करना, जिसे कई शताब्दियों पहले वहां ले जाया गया हो।
नई दिल्ली घोषणा पत्र में कहा गया, “हम आगे संकल्प और प्रतिज्ञा करते हैं कि हम सब मिलकर भारत की अमूल्य पांडुलिपि धरोहर की रक्षा करेंगे और इसे विकसित भारत 2047 की सांस्कृतिक एवं बौद्धिक नींव के रूप में सुरक्षित रखेंगे, वैश्विक पहल करेंगे ताकि भारत पांडुलिपियों का सबसे प्रमुख केंद्र बने… और ‘ज्ञान भारतम’ को एक जन आंदोलन बनाकर सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान आधारित विकास को सशक्त करेंगे।”
इसमें यह भी संकल्प लिया गया कि “हर लिपि और भाषा का पोषण” किया जाएगा, ताकि सभी क्षेत्रों की पांडुलिपियों की देखभाल हो सके, जो एकता, विविधता और समुदायों के बीच सांस्कृतिक संबंधों की गहराई का प्रतीक हैं।
घोषणा पत्र ने जनता में जागरूकता अभियानों का आह्वान किया ताकि “भारत की पांडुलिपि परंपराओं” के प्रति सम्मान, जिज्ञासा और गर्व की भावना जागृत हो; तथा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन किया जा सके ताकि वे ज्ञान भारतम की भावना को बनाए रखें और भारत की लिखित ज्ञान परंपराओं को आगे बढ़ाएं।
घोषणा पत्र में विभिन्न प्रतिज्ञाओं के पहले अक्षर—जैसे guard का ‘g’, yield का ‘y’, और mentor का ‘m’—मिलकर ‘Gyan Bharatam’ शब्द बनाते हैं।
सम्मेलन में भारत और विदेश से आए विद्वानों, विशेषज्ञों, संस्थानों और सांस्कृतिक कर्मियों सहित 1,100 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, संस्कृति मंत्रालय ने कहा।
केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने नई दिल्ली घोषणा पत्र को केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि “सभी प्रतिभागियों का सामूहिक संकल्प” बताया। उन्होंने इस अवसर पर ज्ञान भारतम मिशन का लोगो भी जारी किया।
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