पीएमएलए प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, ‘अमीर आरोपियों’ को कानून पर हमला करने से सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

New Delhi: A view of Supreme Court of India, in New Delhi, Tuesday, Dec. 16, 2025. (PTI Photo/Shahbaz Khan)(PTI12_16_2025_000044B)

नई दिल्ली, 6 जनवरी (पीटीआई) सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे से जुड़े धन शोधन मामले में आरोपी एक वकील की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के एक प्रावधान की वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि उसे आम नागरिकों की तरह ही मुकदमे का सामना करना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने वकील गौतम खेतान की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा, “सिर्फ इसलिए कि मैं अमीर हूं, मैं कानून की वैधता को चुनौती दूं… यह प्रथा बंद होनी चाहिए।”

सीजेआई ने कहा, “यह अब एक अनोखा चलन बन गया है। जब मुकदमा चल रहा होता है, तो अमीर और प्रभावशाली लोग इस अदालत में आकर कानून की वैधता को चुनौती देने लगते हैं। अगर आप आरोपी हैं, तो किसी भी आम नागरिक की तरह मुकदमे का सामना करें।”

खेतान ने पीएमएलए की धारा 44(1)(सी) को चुनौती दी है।

इस प्रावधान के तहत यदि पीएमएलए के लिए नामित विशेष अदालत के अलावा कोई अन्य अदालत किसी ‘अनुसूचित अपराध’ (प्राथमिक अपराध) का संज्ञान लेती है, तो अधिकृत प्राधिकारी के आवेदन पर उस मामले को धन शोधन अपराध से निपटने वाली विशेष अदालत में स्थानांतरित किया जाना अनिवार्य है।

इस प्रावधान का उद्देश्य क्षेत्राधिकार से जुड़े टकराव को रोकना, मुकदमों को सुव्यवस्थित करना और यह सुनिश्चित करना है कि एक ही अदालत प्राथमिक अपराध और धन शोधन के आरोप दोनों पर निर्णय करे।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि वह उस बढ़ते चलन को स्वीकार नहीं करती, जिसमें आपराधिक मुकदमे लंबित होने के दौरान संपन्न आरोपी शीर्ष अदालत का रुख कर वैधानिक प्रावधानों की वैधता को चुनौती देते हैं।

खेतान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि धारा 44(1)(सी) की संवैधानिक वैधता प्रश्नों के घेरे में है और इस पर अदालत को विचार करना चाहिए।

पीठ ने कहा कि पीएमएलए के प्रावधानों की वैधता पहले से ही विजय मदनलाल मामले के फैसले से उत्पन्न पुनर्विचार याचिकाओं में विचाराधीन है।

सीजेआई ने कहा, “चूंकि पीएमएलए के प्रावधानों की वैधता से संबंधित मुद्दा कुछ पुनर्विचार याचिकाओं में विचाराधीन है, इसलिए हमें प्रतीत होता है कि धारा 44(1)(सी) की वैधता उन्हीं कार्यवाहियों के दौरान जांची जाएगी। अलग से रिट याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं है।”

पीठ ने कानून के प्रश्न को खुला रखते हुए याचिका खारिज कर दी और कहा कि वह वरिष्ठ अधिवक्ता लूथरा को लंबित पुनर्विचार याचिकाओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति दे सकती है।