‘बुरे पड़ोसियों’ के मामले में भारत को अपने लोगों की रक्षा का पूरा अधिकार है: जयशंकर

**EDS: SCREENGRAB VIA PTI VIDEOS** Thanjavur: External Affairs Minister S Jaishankar, along with his wife Kyoko Jaishankar, offers prayers at the Airavatesvara Temple in Thanjavur, Tamil Nadu, Tuesday, Dec. 30, 2025. (PTI Photo)(PTI12_30_2025_000352B)

चेन्नई, 2 जनवरी (पीटीआई): विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार को कहा कि “बुरे पड़ोसियों” के मामले में भारत को अपने लोगों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है और एक पड़ोसी देश अगर भारत में आतंकवाद फैलाता रहे तो वह नई दिल्ली से पानी साझा करने की मांग नहीं कर सकता।

साथ ही उन्होंने कहा कि “अच्छे पड़ोसियों” के साथ भारत निवेश करता है, मदद करता है और साझा करता है—चाहे वह कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन आपूर्ति हो, यूक्रेन संघर्ष के समय ईंधन और खाद्य सहायता हो, या श्रीलंका के वित्तीय संकट के दौरान 4 अरब अमेरिकी डॉलर की मदद।

पाकिस्तान का नाम लिए बिना जयशंकर ने कहा कि “बुरे पड़ोसियों” के मामले में भारत को अपने लोगों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है और कोई भी देश यह नहीं तय कर सकता कि भारत इस अधिकार का प्रयोग कैसे करे।

आईआईटी मद्रास में एक ‘फायरसाइड चैट’ के दौरान उन्होंने कहा,

“लोग कूटनीति को रॉकेट साइंस जैसा बताते हैं, जबकि यह सामान्य समझ की बात है। सामान्य समझ से देखें तो पड़ोसी के साथ क्या किया जाता है? अगर कोई पड़ोसी आपके लिए अच्छा है या कम से कम नुकसानदेह नहीं है, तो आपकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि आप उसकी मदद करें, मित्रता बढ़ाएं। और यही हम एक देश के रूप में करते हैं।”

उन्होंने कहा कि जहां भी पड़ोस में अच्छे संबंध हैं, वहां भारत निवेश करता है, मदद करता है और साझा करता है।

“लेकिन जब कोई पड़ोसी जानबूझकर, लगातार और बिना पछतावे के आतंकवाद जारी रखता है, तो हमें अपने लोगों को आतंकवाद से बचाने का अधिकार है। हम उस अधिकार का प्रयोग करेंगे। उसे कैसे प्रयोग करना है, यह हम तय करेंगे। कोई हमें यह नहीं बता सकता कि हमें क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए,” उन्होंने कहा।

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्षों पहले जल-साझेदारी का एक समझौता हुआ था, लेकिन

“अगर दशकों से आतंकवाद चलता रहा है, तो वहां अच्छी पड़ोसियत नहीं रह जाती। और अगर अच्छी पड़ोसियत नहीं है, तो उसके लाभ भी नहीं मिलते। आप यह नहीं कह सकते कि ‘मेरे साथ पानी साझा करो’, लेकिन साथ ही आतंकवाद भी जारी रखो। यह मेल नहीं खाता।”

जयशंकर ने कहा कि अन्य देशों के साथ संवाद करना जरूरी है ताकि भारत की मंशा को गलत न समझा जाए।

“गलतफहमी से बचने का तरीका संवाद है। अगर आप स्पष्ट, ईमानदार और अच्छे से संवाद करते हैं, तो दूसरे देश उसका सम्मान करते हैं और स्वीकार करते हैं।”

उन्होंने कहा कि दुनिया के कई लोग अपनी संस्कृति, परंपरा और विरासत पर गर्व करते हैं और भारत को भी ऐसा करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

“बहुत कम प्राचीन सभ्यताएं हैं जो आज के दौर में प्रमुख आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनी हैं, और भारत उनमें से एक है।”

जयशंकर ने कहा कि लोकतांत्रिक राजनीतिक मॉडल को अपनाने का भारत का निर्णय ही लोकतंत्र को एक सार्वभौमिक अवधारणा बनाने में अहम रहा।

“अगर हमने यह रास्ता नहीं चुना होता, तो लोकतंत्र एक सीमित और क्षेत्रीय अवधारणा बनकर रह जाता। पश्चिम के साथ साझेदारी भी महत्वपूर्ण है, और इसी तरह हम दुनिया को आकार देते हैं,” उन्होंने कहा।

उन्होंने बताया कि वह दो दिन पहले ही बांग्लादेश गए थे, जहां उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

“कुल मिलाकर, हमारे पड़ोस के प्रति हमारा दृष्टिकोण सामान्य समझ से निर्देशित है। अच्छे पड़ोसियों के साथ भारत निवेश करता है, मदद करता है और साझा करता है—चाहे वह कोविड के दौरान वैक्सीन हो, यूक्रेन संकट के समय ईंधन और भोजन हो, या श्रीलंका को दी गई 4 अरब डॉलर की सहायता,” उन्होंने कहा।

विदेश मंत्री ने कहा कि देश पहले घरेलू स्तर पर विकास करते हैं और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ते हैं, जिससे वैश्विक वातावरण का उपयोग अपने विकास के लिए कर सकें।

“जब हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ कहते हैं, तो उसका अर्थ है कि हमने कभी दुनिया को शत्रुतापूर्ण जगह नहीं माना। हमारे संसाधन सीमित हैं, और सीमित संसाधनों के साथ अधिकतम प्रभाव कैसे डाला जाए—यही असली चुनौती है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने बताया कि आज की भारतीय विदेश नीति और कूटनीति इसी समस्या को हल करने का प्रयास कर रही है—अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता, ताकतों और अन्य संस्थानों व संभावनाओं का उपयोग करके।

अरुणाचल प्रदेश की एक महिला को शंघाई हवाई अड्डे पर चीनी आव्रजन अधिकारियों द्वारा रोके जाने की हालिया घटना पर पूछे गए सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा,

“अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है और हमेशा रहेगा। इस तरह की चालों से जमीनी हकीकत नहीं बदलेगी। भारत अपने लोगों और अपनी सुरक्षा की रक्षा करेगा, किसी भी दबाव के बिना।”

इस अवसर पर जयशंकर ने ‘आईआईटीएम ग्लोबल रिसर्च फाउंडेशन’ का भी शुभारंभ किया—जो आईआईटी मद्रास की एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहल है और संस्थान को शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता के लिए वैश्विक रूप से जुड़ा हुआ केंद्र बनाने की दिशा में काम करेगी।