न्यूयॉर्क, 29 जनवरी (पीटीआई) भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के बाद अमेरिका ने यूरोप की कड़ी आलोचना करते हुए उसे “बेहद निराशाजनक” बताया है। अमेरिका का कहना है कि इस व्यापार समझौते के कारण यूरोपीय देश भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर नई दिल्ली के खिलाफ शुल्क लगाने में वॉशिंगटन के साथ खड़े नहीं हुए।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने बुधवार को सीएनबीसी के कार्यक्रम ‘स्क्वॉक ऑन द स्ट्रीट’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “वे अपने हित में जो सही समझें वह करें, लेकिन मैं यह जरूर कहूंगा कि मुझे यूरोपीय देश बेहद निराशाजनक लगे, क्योंकि यूक्रेन-रूस युद्ध की अग्रिम पंक्ति में यूरोप ही है।”
बेसेन्ट “यूरोप और भारत के बीच हुए विशाल व्यापार समझौते” और इसके अमेरिका पर प्रभाव से जुड़े एक सवाल का जवाब दे रहे थे।
उन्होंने कहा, “भारत ने प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदना शुरू किया और अनुमान लगाइए कि परिष्कृत उत्पाद कौन खरीद रहा था? यूरोपीय। इस तरह यूरोप खुद के खिलाफ चल रहे युद्ध को ही फंड कर रहा था — यह ऐसा है, जिसे गढ़ा भी नहीं जा सकता।”
उन्होंने कहा, “अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर भारत पर प्रतिबंध लगाए या 25 प्रतिशत शुल्क लगाया। यूरोपीय देश हमारे साथ नहीं आए क्योंकि वे यह व्यापार समझौता करना चाहते थे। इसलिए जब भी कोई यूरोपीय यूक्रेनी लोगों के महत्व की बात करे, तो याद रखिए कि उन्होंने यूक्रेनी लोगों से ऊपर व्यापार को रखा। व्यापार — यूरोपीय व्यापार — यूक्रेन में युद्ध खत्म करने से ज्यादा महत्वपूर्ण था।”
ऊर्जा जरूरतों से जुड़े सवाल पर बेसेन्ट ने कहा, “उन्हें ऊर्जा चाहिए, लेकिन एक कीमत पर। वे सस्ती ऊर्जा चाहते हैं। अगर हम भी प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदने को तैयार होते, तो हमें भी सस्ती ऊर्जा मिल सकती थी।”
बेसेन्ट की ये टिप्पणियां ट्रंप प्रशासन की ओर से भारत-ईयू व्यापार समझौते पर दो दिनों में आई दूसरी प्रतिक्रिया थीं। मंगलवार को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने नई दिल्ली में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए, तब अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीयर ने कहा था कि इस सौदे में भारत “ऊपर” रहा है।
ग्रीयर ने फॉक्स बिजनेस को दिए साक्षात्कार में कहा, “मैंने अब तक समझौते के कुछ विवरण देखे हैं। ईमानदारी से कहूं तो इसमें भारत को ज्यादा फायदा मिला है। उसे यूरोप में ज्यादा बाजार पहुंच मिली है।”
उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि भारत को कुछ अतिरिक्त आव्रजन अधिकार भी मिले हैं। मुझे पूरी तरह यकीन नहीं है, लेकिन यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष वॉन डेर लेयेन ने भारतीय श्रमिकों की यूरोप में आवाजाही की बात की है।”
ग्रीयर ने कहा, “कुल मिलाकर भारत के लिए यह एक सुनहरा दौर होगा। उसके पास सस्ता श्रम है और ऐसा लगता है कि यूरोपीय संघ वैश्वीकरण को और आगे बढ़ा रहा है, जबकि हम अमेरिका में वैश्वीकरण की कुछ समस्याओं को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं।”
भारत-ईयू व्यापार समझौते पर अपनी राय पूछे जाने पर ग्रीयर ने कहा, “रणनीतिक रूप से यह समझना जरूरी है कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता देने और अमेरिकी बाजार तक पहुंच के लिए शुल्क लगाने के बाद, दूसरे देश अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के लिए नए बाजार तलाश रहे हैं। इसी कारण यूरोपीय संघ भारत की ओर रुख कर रहा है।”
उन्होंने कहा, “ईयू व्यापार पर बहुत अधिक निर्भर है। अगर वह अपना सारा सामान अमेरिका नहीं भेज सकता, तो उसे दूसरे विकल्पों की जरूरत है।”
भारत और यूरोपीय संघ ने इस ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते — जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है — पर हस्ताक्षर कर दो अरब लोगों के साझा बाजार का रास्ता खोल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी और शीर्ष यूरोपीय नेतृत्व ने व्यापार और रक्षा सहयोग के जरिए नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था की रक्षा के लिए पांच साल का परिवर्तनकारी एजेंडा भी पेश किया।
दोनों पक्षों ने सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर एक समझौता तथा भारतीय प्रतिभाओं की यूरोप में आवाजाही से जुड़ा एक और अहम करार भी किया। यह शिखर वार्ता अमेरिका के साथ ठंडे होते संबंधों के बीच हुई।
अधिकारियों के अनुसार, यह मुक्त व्यापार समझौता वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग एक-चौथाई हिस्से को कवर करेगा। इसके तहत भारत के 99 प्रतिशत निर्यातों पर यूरोपीय संघ में शुल्क कम होंगे, जबकि ईयू के 97 प्रतिशत से अधिक निर्यातों पर भारत में शुल्क में कटौती की जाएगी।
इस समझौते से भारत के वस्त्र, परिधान, चमड़ा उत्पाद, हस्तशिल्प, जूते और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है, जबकि यूरोप को शराब, ऑटोमोबाइल, रसायन और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में फायदा होगा।
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