
कोलकाता, 24 दिसंबर (पीटीआई) — बिना हाथों के जन्म लेने के बावजूद शीतल देवी ने 2025 में अपने असाधारण कारनामों से भारतीय तीरंदाज़ी को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया, लेकिन अगले साल होने वाले एशियाई खेलों से पहले रिकर्व वर्ग में अस्थिर प्रदर्शन और प्रशासनिक चिंताओं ने इस खेल को पीछे भी खींचा।
जम्मू के किश्तवाड़ की रहने वाली 18 वर्षीय शीतल पूरे साल जुझारूपन की मिसाल बनी रहीं और लगातार प्रभावशाली प्रदर्शन किया। पेरिस 2024 पैरालंपिक में कांस्य पदक जीत चुकी शीतल ने पैरा तीरंदाज़ी में पहली बिना हाथों वाली महिला विश्व चैंपियन बनकर इतिहास रच दिया।
दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू में हुई वर्ल्ड पैरा आर्चरी चैंपियनशिप में शीतल ने महिलाओं के कंपाउंड ओपन वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। फाइनल में उन्होंने तुर्किये की पैरालंपिक चैंपियन ओज़नूर क्योर गिर्दी को हराया। इसके अलावा उन्होंने टीम स्पर्धा में रजत और मिक्स्ड टीम में कांस्य पदक भी अपने नाम किया, जिससे उनका अभियान यादगार बन गया।
फोकोमेलिया नामक एक दुर्लभ जन्मजात स्थिति के कारण बिना हाथों के जन्मी शीतल ने सीमाओं को और आगे बढ़ाते हुए पहली बार सक्षम खिलाड़ियों की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए क्वालिफाई किया। सोनीपत में हुए राष्ट्रीय चयन ट्रायल में 60 से अधिक सक्षम तीरंदाज़ों के खिलाफ मुकाबला करते हुए शीतल ने महिलाओं के कंपाउंड वर्ग में तीसरा स्थान हासिल किया और जेद्दा में होने वाले एशिया कप स्टेज-3 के लिए भारतीय जूनियर टीम में जगह बनाई, हालांकि यह प्रतियोगिता बाद में कार्यक्रम संबंधी कारणों से टल गई।
2025 में कंपाउंड तीरंदाज़ी को आखिरकार दशकों के इंतज़ार के बाद ओलंपिक मान्यता मिली। अप्रैल में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने घोषणा की कि 2028 लॉस एंजिलिस ओलंपिक में कंपाउंड मिक्स्ड टीम स्पर्धा को तीरंदाज़ी कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा। 1972 में ओलंपिक में तीरंदाज़ी की वापसी के बाद पहली बार किसी नए बो-स्टाइल को जोड़ा गया है। इससे ओलंपिक तीरंदाज़ी की कुल पदक स्पर्धाएँ छह हो गई हैं। भारत के लिए, जो अब तक ओलंपिक तीरंदाज़ी में पदक नहीं जीत पाया है लेकिन कंपाउंड वर्ग में दुनिया की सबसे मजबूत टीमों में शामिल है, यह फैसला बड़ी राहत के रूप में आया। अभिषेक वर्मा, ज्योति सुरेखा वेन्नम और ऋषभ यादव जैसे तीरंदाज़ अब लॉस एंजिलिस 2028 में वास्तविक पदक उम्मीद बन गए हैं।
एशियाई तीरंदाज़ी चैंपियनशिप में भारत ने ढाका में शानदार प्रदर्शन करते हुए पदक तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया। भारत ने छह स्वर्ण, तीन रजत और एक कांस्य सहित कुल 10 पदक जीते। इस दौरान भारत ने कई स्पर्धाओं में पारंपरिक ताकत दक्षिण कोरिया को पीछे छोड़ा। अंकिता भगत ने महिलाओं के रिकर्व व्यक्तिगत वर्ग में स्वर्ण जीता, जबकि धीरज बोम्मदेवरा ने पुरुषों का रिकर्व खिताब अपने नाम किया। यह पहला मौका था जब भारत ने एशियाई चैंपियनशिप में दोनों व्यक्तिगत रिकर्व स्वर्ण जीते। पुरुषों की रिकर्व टीम ने भी शूट-ऑफ में कोरिया को हराकर उनका दबदबा तोड़ा। हालांकि यह सफलता कोरिया की दूसरी पंक्ति की टीम के खिलाफ आई, जिसमें किम वूजिन जैसे बड़े नाम शामिल नहीं थे, इसलिए असली परीक्षा एशियाई खेलों में होगी।
ढाका की सफलता के बावजूद वैश्विक स्तर पर भारत के रिकर्व तीरंदाज़ों का साल मुश्किल रहा। विश्व चैंपियनशिप में भारत एक भी पदक नहीं जीत सका, जिससे शीर्ष स्तर पर निरंतरता और प्रदर्शन को भुनाने की कमी साफ दिखी। एशियाई खेलों से पहले यह चिंता का विषय बना हुआ है।
ढाका में अंकिता ने अपने करियर की सबसे बड़ी जीत दर्ज करते हुए पेरिस 2024 ओलंपिक रजत पदक विजेता नाम सुह्योन को फाइनल में 7-3 से हराया। इस ऐतिहासिक स्वर्ण की राह में उन्होंने सेमीफाइनल में सीनियर साथी और पूर्व विश्व नंबर एक दीपिका कुमारी को कड़े मुकाबले में मात दी। यह हार दीपिका के लगातार गिरते प्रदर्शन की ओर इशारा करती है। चार बार की ओलंपियन दीपिका इस साल विश्व कप सर्किट पर केवल एक व्यक्तिगत कांस्य जीत सकीं और एशियाई चैंपियनशिप में भी कांस्य पदक से चूक गईं। यह ऐसे समय में हुआ है जब युवा पीढ़ी उभर रही है। 15 वर्षीय गाथा खड़ाके और 16 वर्षीय शरवरी शिंदे ने विश्व कप में पदार्पण किया। कंपाउंड वर्ग में भी ऋषभ यादव और पृथिका ने लगातार अच्छे प्रदर्शन से भारत की गहराई को मजबूत किया।
कंपाउंड तीरंदाज़ी एक बार फिर भारत का सबसे भरोसेमंद वर्ग साबित हुई। ज्योति ने नानजिंग में आर्चरी वर्ल्ड कप फाइनल में कांस्य जीतकर इतिहास रचा और ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। गौरतलब है कि किसी भी भारतीय रिकर्व तीरंदाज़ ने सीज़न के अंत में होने वाले वर्ल्ड कप फाइनल के लिए क्वालिफाई नहीं किया, जिससे दोनों वर्गों के बीच बढ़ता अंतर उजागर हुआ।
कई वर्षों की योजना के बाद 2025 में आर्चरी प्रीमियर लीग की शुरुआत हुई। दक्षिण कोरिया की गैरमौजूदगी के कारण लीग की चमक थोड़ी कम रही, लेकिन इसमें ब्रैडी एलिसन, मेटे गाज़ोज़ और अलेजांद्रा वालेंसिया जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय नाम शामिल हुए। टोक्यो ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता गाज़ोज़ की अगुवाई वाली राजपूताना रॉयल्स ने पहला खिताब जीता, जिससे भारतीय तीरंदाज़ी को एक पेशेवर मंच मिला।
जहाँ प्रदर्शन उम्मीद जगा रहे हैं, वहीं प्रशासनिक मुद्दे चिंता बने हुए हैं। एशियाई खेलों से पहले आर्चरी एसोसिएशन ऑफ इंडिया रिकर्व और कंपाउंड दोनों वर्गों में विदेशी मुख्य कोच नियुक्त करने में नाकाम रही। कोरियाई कोच किसिक ली के साथ रिकर्व टीम को लेकर बातचीत भुगतान संबंधी मुद्दों पर अटक गई। पिछले एशियाई खेलों में भारत को मजबूत प्रदर्शन दिलाने वाले सर्जियो पाग्नी की दोबारा नियुक्ति पर भी सहमति नहीं बन सकी।
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