नई दिल्ली, 23 दिसंबर (पीटीआई) — भारत ने न्यूजीलैंड से आयात होने वाले सेब, कीवीफ्रूट और मनुका शहद पर कोटा-आधारित शुल्क रियायतों को मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के तहत तय की गई कृषि उत्पादकता कार्ययोजनाओं के क्रियान्वयन से जोड़ दिया है। अधिकारियों ने मंगलवार को यह जानकारी दी।
वाणिज्य मंत्रालय ने कहा कि इन कार्ययोजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी संयुक्त कृषि उत्पादकता परिषद (जेएपीसी) द्वारा की जाएगी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य बाजार तक पहुंच और संवेदनशील घरेलू कृषि क्षेत्रों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाना है। मंत्रालय ने कहा, “सेब, कीवीफ्रूट और मनुका शहद के लिए सभी टैरिफ रेट कोटे कृषि उत्पादकता कार्ययोजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े होंगे और जेएपीसी द्वारा उनकी निगरानी की जाएगी।”
समझौते के तहत न्यूजीलैंड ने भारत में उत्पादकता, गुणवत्ता और क्षेत्रीय क्षमताओं में सुधार के लिए केंद्रित कार्ययोजनाओं पर सहमति जताई है। इनमें उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना, बेहतर रोपण सामग्री, किसानों के लिए क्षमता निर्माण, बाग प्रबंधन, कटाई के बाद की प्रक्रियाएं, आपूर्ति शृंखला और खाद्य सुरक्षा में तकनीकी सहयोग शामिल है। प्रीमियम सेब उत्पादन और टिकाऊ मधुमक्खी पालन से जुड़े प्रोजेक्ट्स से घरेलू उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ने की उम्मीद है।
न्यूजीलैंड ने कहा है कि वह इस तरह के समझौते के तहत सेब पर शुल्क रियायत पाने वाला पहला देश है। भारत वर्तमान में सेब के आयात पर 50 प्रतिशत शुल्क लगाता है। समझौते के तहत घरेलू किसानों के हितों की रक्षा के लिए टैरिफ रेट कोटा और न्यूनतम आयात मूल्य ढांचे के भीतर ही रियायतें लागू होंगी।
भारत न्यूजीलैंड से हर साल करीब 31,393 टन सेब आयात करता है, जिसकी कीमत लगभग 3.24 करोड़ अमेरिकी डॉलर है, जबकि कुल सेब आयात 5,19,650 टन से अधिक है, जिसका मूल्य 42.46 करोड़ अमेरिकी डॉलर है। समझौते के अनुसार, शुल्क रियायतें शुरुआत में 32,500 टन पर लागू होंगी, जो छठे वर्ष तक बढ़कर 45,000 टन हो जाएंगी। इस पर 25 प्रतिशत की रियायती शुल्क दर और 1.25 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य लागू होगा। कोटे से अधिक आयात पर मौजूदा 50 प्रतिशत शुल्क लगेगा।
समझौते में यह भी प्रावधान है कि न्यूजीलैंड से सेब, कीवीफ्रूट, मनुका शहद और एल्ब्यूमिन्स के लिए बाजार पहुंच टैरिफ रेट कोटा के माध्यम से नियंत्रित की जाएगी, ताकि गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके, उपभोक्ताओं को विकल्प मिलें और भारतीय किसानों के हित सुरक्षित रहें।
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