
नई दिल्ली, 17 फरवरी (PTI) — आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)-सक्षम स्वास्थ्य देखभाल और फ्रंटियर साइंस में भारत की बढ़ती क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने सोमवार को एआईआईएमएस, दिल्ली और अंटार्कटिका के मैत्री रिसर्च स्टेशन को जोड़ने वाले देशी टेली-रोबोटिक अल्ट्रासोनोग्राफी सिस्टम का सफल लाइव प्रदर्शन देखा।
राष्ट्रीय राजधानी में चल रही AI चर्चाओं का हवाला देते हुए, सिंह ने कहा कि इस तरह के नवाचार AI, रोबोटिक्स और रीयल-टाइम मेडिकल विशेषज्ञता का संगम दर्शाते हैं, जिससे विशेषज्ञ स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच भौगोलिक सीमाओं से परे बढ़ती है।
AIIMS और IIT दिल्ली ने नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च (पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत) के सहयोग से यह सिस्टम विकसित किया है। इसके माध्यम से दिल्ली में बैठे डॉक्टर ने अंटार्कटिका में 12,000 किलोमीटर दूर स्थित स्वयंसेवक की वास्तविक समय में अल्ट्रासाउंड जांच की।
रोबोटिक आर्म, जो अल्ट्रासाउंड प्रोब से लैस है, विशेषज्ञ सोनोग्राफर के सटीक हाथ की हरकतों की नकल करता है। फोर्स-सेंसिंग सुरक्षा फीचर्स और एक सेकंड से भी कम विलंब के साथ भरोसेमंद इमेजिंग प्रदान करने वाला यह सिस्टम इमरजेंसी-फोकस्ड असेसमेंट, जैसे FAST स्कैन, पेट के अंगों का मूल्यांकन, कार्डियक असेसमेंट और ट्रॉमा स्क्रीनिंग में मदद करता है।
इस तकनीक को चरम और दूरस्थ पर्यावरणों के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे यह तय करने में मदद मिलती है कि मरीज को स्थानीय स्तर पर संभाला जा सकता है या उसे एयरलिफ्ट करना आवश्यक है, जो अंटार्कटिका में महंगा और जटिल होता है।
सिंह ने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “whole of science” और “whole of government” की दृष्टि को दर्शाती है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों की संस्थाएं एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए एक साथ आती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के पोलर एक्सपीडिशन और ओशन मिशन केवल भूविज्ञान शोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये वास्तविक दुनिया में नवाचार के प्लेटफ़ॉर्म बनते जा रहे हैं। अंटार्कटिका की चुनौतियों से प्रेरित यह टेली-रोबोटिक सिस्टम दिखाता है कि फील्ड अनुभव कैसे बड़े पैमाने पर तकनीकी समाधानों में बदल सकता है।
सिंह ने ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य देखभाल में बढ़ते अंतर और दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर की उपस्थिति सुनिश्चित करने में कठिनाइयों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि टेलीमेडिसिन, AI-ड्रिवन डायग्नोस्टिक्स और रोबोटिक हस्तक्षेप जैसी उभरती तकनीकें इस अंतर को पाट सकती हैं और आने वाले वर्षों में क्लिनिकल प्रैक्टिस को पुनर्परिभाषित कर सकती हैं।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. रवीचंद्रन ने कहा कि इस नवाचार से अंटार्कटिका से इमरजेंसी निकासी की जरूरत काफी कम हो सकती है और भारत की पोलर क्षेत्रों में सहयोगी वैज्ञानिक उपस्थिति मजबूत हो सकती है। उन्होंने इसे अंतर-संस्थागत और अंतर-मंत्रालयीय सहयोग का मॉडल बताया।
सिंह ने कहा कि भारत की वैज्ञानिक इकोसिस्टम से उभरते नवाचार आज स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच के नए क्षितिज खोल रहे हैं, जिससे अंटार्कटिका से लेकर सबसे दूरस्थ गांवों तक उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं संभव हो रही हैं और भारत का विज्ञान, प्रौद्योगिकी और समेकित शासन द्वारा संचालित विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में मार्ग सुदृढ़ हो रहा है।
वर्ग: ब्रेकिंग न्यूज
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