मजबूत उद्देश्य (मोटिव) के प्रमाण के अभाव में भी यदि मृत्यु पूर्व बयान विश्वसनीय हो तो अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट

New Delhi: Security heightened outside the Supreme Court, in New Delhi, Monday, Jan. 5, 2026. Supreme Court on Monday refused to grant bail to activists Umar Khalid and Sharjeel Imam in the 2020 Delhi riots conspiracy matter, saying there was a prima facie case against them under the Unlawful Activities (Prevention) Act. (PTI Photo/Atul Yadav)(PTI01_05_2026_000101B)

नई दिल्ली, 15 जनवरी (पीटीआई): सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि यदि मृत्यु पूर्व दिया गया बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) विश्वसनीय और भरोसेमंद हो, तो मजबूत उद्देश्य (मोटिव) के प्रमाण के अभाव में भी अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर नहीं होता।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने चमन लाल को बरी करने के फैसले को पलटते हुए यह टिप्पणी की। चमन लाल पर अपनी पत्नी सारो देवी पर केरोसिन डालकर आग लगाने से हत्या करने का आरोप था। अदालत ने कहा कि उद्देश्य का महत्व मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में होता है।

शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें चमन लाल को हत्या का दोषी ठहराया गया था, और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मृत्यु पूर्व बयान पर संदेह जताते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने मृत्यु पूर्व बयान पर दो आधारों पर संदेह जताया था—पहला, बयान दर्ज किए जाने के समय को लेकर कथित असंगति, और दूसरा, इस बात पर संदेह कि क्या चंबा जिले के तहसीलदार-सह-कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने स्वयं बयान दर्ज किया था या केवल उसे लिखवाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए दोनों ही आधार टिकाऊ नहीं हैं।

पीठ ने कहा, “उद्देश्य का महत्व मुख्यतः परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में होता है। जहां प्रत्यक्ष साक्ष्य के रूप में एक विश्वसनीय और भरोसेमंद मृत्यु पूर्व बयान मौजूद हो, वहां मजबूत उद्देश्य के प्रमाण का अभाव अभियोजन के लिए घातक नहीं होता।”

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी चमन लाल अपनी पत्नी को बार-बार झगड़ों, अपमान और मौखिक उत्पीड़न का शिकार बनाता था। वह उसे ‘कंजरी’ (चरित्रहीन महिला) कहकर अपमानित करता था और उसे बार-बार ससुराल छोड़ने के लिए कहता था।

न्यायमूर्ति महादेवन, जिन्होंने पीठ की ओर से फैसला लिखा, ने कहा कि मृत्यु पूर्व बयान में ही लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक विवाद और दुर्व्यवहार का उल्लेख है, जो अपराध किए जाने की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है।

उन्होंने कहा, “किसी भी स्थिति में अभियोजन से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह उद्देश्य को गणितीय सटीकता के साथ साबित करे। उद्देश्य को निर्णायक रूप से साबित न कर पाना, किसी अन्यथा विश्वसनीय और ठोस मामले को कमजोर नहीं करता।”

अदालत ने कहा कि समग्र साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद यह स्पष्ट है कि सारो देवी का मृत्यु पूर्व बयान स्वेच्छा से दिया गया, सत्यपूर्ण और भरोसेमंद है।

“यह बयान एक सक्षम प्राधिकारी द्वारा उस समय दर्ज किया गया, जब मृतका पूरी तरह होश में थी, स्थिति को समझने में सक्षम थी और बयान देने योग्य थी। हाईकोर्ट द्वारा बताई गई मामूली विसंगतियां मृत्यु पूर्व बयान की विश्वसनीयता पर कोई आघात नहीं पहुंचातीं। इसलिए अभियोजन ने संदेह से परे यह सिद्ध कर दिया है कि आरोपी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दंडनीय अपराध किया है,” पीठ ने कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मृत्यु पूर्व बयान और उससे जुड़ी परिस्थितियों पर सही तरीके से भरोसा करते हुए आरोपी को दोषी ठहराया था, जबकि हाईकोर्ट ने अटकलों और अत्यधिक तकनीकी आधारों पर इस महत्वपूर्ण साक्ष्य को खारिज कर दिया और शत्रुतापूर्ण तथा बचाव पक्ष के गवाहों के बयानों पर अनावश्यक भरोसा किया।

अदालत ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया, ताकि वह शेष सजा काट सके। ऐसा न करने पर ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करेगा।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 7 दिसंबर 2009 को चमन लाल ने हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रामपुर गांव स्थित अपने घर में अपनी पत्नी सारो देवी पर केरोसिन डालकर माचिस से आग लगा दी थी।

उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन बाद में गंभीर जलने की चोटों के कारण उनकी मौत हो गई।

— पीटीआई