वंशवादी राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए ‘गंभीर ख़तरा’: शशि थरूर

Thiruvananthapuram: Congress MP Shashi Tharoor and LoP in Kerala Assembly V.D. Satheesan during the concluding event of the 'Mahila Saahas Kerala Yatra', in Thiruvananthapuram, Monday, Sept. 29, 2025. (PTI Photo)(PTI09_29_2025_000361B)

नई दिल्ली, 3 नवंबर (PTI): वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा है कि राजनीतिक दलों में व्याप्त वंशवादी राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक “गंभीर खतरा” है और अब समय आ गया है कि भारत “वंशवाद की जगह गुणतंत्र” (मेरिटोक्रेसी) को अपनाए। थरूर ने कहा कि जब राजनीतिक शक्ति क्षमता, प्रतिबद्धता और जमीनी जुड़ाव के बजाय वंश के आधार पर तय होती है तो शासन की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन प्रोजेक्ट सिंडीकेट में प्रकाशित एक लेख में तिरुवनंतपुरम के सांसद थरूर ने कहा कि हालांकि नेहरू-गांधी परिवार को कांग्रेस के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन वंशवाद पूरे राजनीतिक परिदृश्य में फैला हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता संग्राम और देश के इतिहास में इस परिवार का प्रभाव रहा है, लेकिन इससे यह धारणा भी मजबूत हुई है कि राजनीतिक नेतृत्व जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है — और यही सोच हर दल व हर स्तर पर घर कर चुकी है।

थरूर ने विभिन्न उदाहरण देते हुए कहा कि बीजू पटनायक के बाद उनके पुत्र नवीन पटनायक सत्ता में आए। शिवसेना में बाल ठाकरे से उद्धव ठाकरे तक और फिर आदित्य ठाकरे की बारी आने को तैयार है। उन्होंने मुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव, तथा लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास पासवान से चिराग पासवान तक सत्ता के हस्तांतरण का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की तीन पीढ़ियाँ नेतृत्व में रही हैं, जबकि विपक्षी पार्टी दो पीढ़ियों से मुफ़्ती परिवार के प्रभाव में है। पंजाब, तेलंगाना और तमिलनाडु में भी उन्होंने वंशवाद के कई उदाहरण दिए।

थरूर ने कहा कि वंशवादी राजनीति केवल कुछ बड़े परिवारों तक सीमित नहीं, बल्कि पंचायत से संसद तक भारतीय शासन ढांचे में गहराई से समाई हुई है। उन्होंने दक्षिण एशिया के अन्य देशों — पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका — में भी वंशवाद का प्रसार बताया, लेकिन कहा कि भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में यह और भी असंगत लगता है।

थरूर ने कहा कि परिवार का नाम एक “ब्रांड” की तरह काम करता है — जिससे नए उम्मीदवारों को जनता में भरोसा बनाने की मेहनत कम करनी पड़ती है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि साक्षरता और इंटरनेट पहुंच में वृद्धि के बावजूद, यह समस्या मुख्य रूप से आंतरिक पार्टी संरचना और चयन प्रक्रिया से उत्पन्न होती है, जहाँ पारदर्शिता और लोकतांत्रिक निर्णयों की कमी है। “नेतृत्व चयन अक्सर एक छोटे समूह या अकेले नेता के फैसलों पर निर्भर होता है, और ऐसे में योग्यता के बजाय रिश्ता और वफादारी को प्राथमिकता दी जाती है,” उन्होंने लिखा।

थरूर ने चेताया कि जब शासन संभालने वाले सामान्य जनता की चुनौतियों से कटे हुए हों, तो वे लोगों की जरूरतों का प्रभावी समाधान देने में असफल रहते हैं। उन्होंने कहा कि वंशवाद समाप्त करने के लिए आवश्यक सुधार जरूरी हैं — जैसे आंतरिक पार्टी चुनावों को अर्थपूर्ण बनाना, कानूनी रूप से निश्चित कार्यकाल लागू करना और मतदाताओं को जागरूक करना कि वे नेताओं को योग्यता के आधार पर चुनें।

“जब तक भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय बनी रहेगी, तब तक लोकतंत्र की असली भावना — ‘जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा सरकार’ — पूरी तरह साकार नहीं हो पाएगी,” थरूर ने कहा। (PTI)

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