लखनऊ, 1 मार्च (पीटीआई) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि केवल इस आधार पर एफआईआर की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि उसे किसी वकील की सहायता से तैयार किया गया है।
इस टिप्पणी के साथ न्यायालय ने एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, हालांकि उसने उसकी सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 14 वर्ष कर दिया। यह मामला एसिड हमले का था, जिसमें दो महिलाओं की जान चली गई थी।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति ए के चौधरी की पीठ ने 27 फरवरी को प्रतापगढ़ निवासी जगदंबा हरिजन की याचिका पर यह फैसला सुनाया।
प्रतापगढ़ की सत्र अदालत ने अपीलकर्ता को दो महिलाओं पर एसिड हमला कर गैर इरादतन हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अपीलकर्ता का मुख्य तर्क था कि एफआईआर दो दिन बाद दर्ज की गई थी और इसे एक निजी वकील की सहायता से तैयार किया गया था, जिससे रिपोर्ट असत्य हो जाती है।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वकील की सहायता से एफआईआर तैयार करने से उसकी विश्वसनीयता स्वतः प्रभावित नहीं होती।
न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक आपराधिक कार्यवाही में कानूनी सहायता लेना अनुमेय है और एफआईआर दर्ज करते समय सहायता लेना भी सामान्य बात है, इससे तथ्यों की सत्यता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा, “अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य दर्शाते हैं कि गवाहों के बयान तथा चिकित्सकीय और फॉरेंसिक रिपोर्ट अभियोजन के मामले का समर्थन करते हैं।”
हालांकि, न्यायालय ने सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 14 वर्ष कर दिया। उसने यह भी उल्लेख किया कि अपीलकर्ता पहले ही 13 वर्ष, 9 माह और 24 दिन जेल में बिता चुका है। पीटीआई सीओआर एनएवी केवीके केवीके
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