वायु गुणवत्ता एक राष्ट्रीय संकट, सरकार की प्रतिक्रिया बेहद अप्रभावी और अपर्याप्त: कांग्रेस

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नई दिल्ली, 11 जनवरी (पीटीआई)

कांग्रेस ने रविवार को एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि वायु गुणवत्ता एक देशव्यापी, संरचनात्मक संकट बन चुकी है, जिसके प्रति सरकार की प्रतिक्रिया “बेहद अप्रभावी और अपर्याप्त” है। पार्टी ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) में व्यापक सुधार की मांग की।

कांग्रेस के महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने कहा कि जिस एनसीएपी को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वह वास्तव में एक और तरह का एनसीएपी है — “नोटशनल क्लीन एयर प्रोग्राम”

पूर्व पर्यावरण मंत्री रमेश ने कहा कि सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के एक नए विश्लेषण ने भारत का “सबसे खुला रहस्य” उजागर कर दिया है कि वायु गुणवत्ता एक राष्ट्रव्यापी, संरचनात्मक संकट है और इस पर सरकार की प्रतिक्रिया अत्यंत अप्रभावी व नाकाफी है।

उपग्रह आंकड़ों के आधार पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि आकलन किए गए 4,041 वैधानिक नगरों में से लगभग 44 प्रतिशत यानी 1,787 शहर लगातार वायु प्रदूषण से ग्रस्त हैं। इन शहरों में पिछले पांच वर्षों (2019–2024, वर्ष 2020 को छोड़कर) के दौरान वार्षिक पीएम 2.5 स्तर लगातार राष्ट्रीय मानकों से अधिक रहे हैं।

रिपोर्ट में एनसीएपी की अक्षमता को भी उजागर किया गया है। रमेश ने कहा कि समस्या के इतने बड़े पैमाने (1,787 शहर) के बावजूद, नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के तहत केवल 130 शहरों को शामिल किया गया है।

इन 130 शहरों में से 28 शहरों में अब तक निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (CAAQMS) तक नहीं हैं, उन्होंने दावा किया।

जिन 102 शहरों में निगरानी व्यवस्था मौजूद है, उनमें से 100 शहरों में पीएम10 का स्तर 80 प्रतिशत या उससे अधिक दर्ज किया गया।

रमेश ने कहा कि कुल मिलाकर एनसीएपी फिलहाल भारत के केवल 4 प्रतिशत दीर्घकालिक रूप से प्रदूषित शहरों को ही संबोधित कर रहा है। उन्होंने दोहराया कि एनसीएपी को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम कहा जा रहा है, जबकि यह वास्तव में नोटशनल क्लीन एयर प्रोग्राम है और अब इसमें व्यापक सुधार व पुनर्गठन की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा,

“पहला कदम यह होना चाहिए कि भारत के बड़े हिस्सों में वायु प्रदूषण से जुड़ी जन-स्वास्थ्य आपदा को स्वीकार किया जाए। इसके बाद हमें वायु प्रदूषण (नियंत्रण और रोकथाम) अधिनियम, 1981 और नवंबर 2009 में लागू राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) की पूरी तरह समीक्षा और पुनर्गठन करना होगा।”

रमेश ने बताया कि एनएएक्यूएस के तहत सूक्ष्म कणों (पीएम 2.5) की अनुमेय सीमा 24 घंटे के लिए 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और वार्षिक आधार पर 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशा-निर्देश 24 घंटे के लिए 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम और वार्षिक स्तर पर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर निर्धारित करते हैं।

उन्होंने सरकार से एनसीएपी के तहत उपलब्ध कराए जाने वाले धन में भारी बढ़ोतरी की मांग की।

रमेश ने कहा,

“एनसीएपी और 15वें वित्त आयोग के अनुदानों को मिलाकर मौजूदा बजट करीब 10,500 करोड़ रुपये है, जो केवल 131 शहरों के लिए है। हमारे शहरों को इससे 10 से 20 गुना अधिक धन की जरूरत है। एनसीएपी को 25,000 करोड़ रुपये का कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए और इसे देश के 1,000 सबसे प्रदूषित शहरों तक विस्तारित किया जाना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि एनसीएपी में प्रदर्शन का पैमाना पीएम 2.5 स्तर को बनाया जाना चाहिए और कार्यक्रम का फोकस ठोस ईंधन जलाने, वाहन उत्सर्जन और औद्योगिक उत्सर्जन जैसे प्रमुख प्रदूषण स्रोतों पर होना चाहिए।

पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि एनसीएपी को कानूनी आधार, प्रभावी प्रवर्तन तंत्र और हर भारतीय शहर के लिए गंभीर डेटा निगरानी क्षमता दी जानी चाहिए, न कि केवल मौजूदा ‘नॉन-अटेनमेंट’ शहरों तक सीमित रखा जाए।

रमेश ने यह भी कहा कि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए वायु प्रदूषण मानकों को तुरंत लागू किया जाना चाहिए और सभी बिजली संयंत्रों को 2026 के अंत तक फ्लू गैस डीसल्फराइज़र (FGD) लगाना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

उन्होंने मांग की कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की स्वतंत्रता बहाल की जाए और पिछले 10 वर्षों में किए गए जनविरोधी पर्यावरण कानून संशोधनों को वापस लिया जाए।

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया,

“संसद में अब तक दो बार — पहले 29 जुलाई 2024 को और फिर 9 दिसंबर 2025 को — मोदी सरकार ने वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों को कमतर दिखाने की कोशिश की है। मोदी सरकार सच्चाई से अनजान नहीं है, बल्कि वह अपनी अक्षमता और लापरवाही के पैमाने को छिपाने का प्रयास कर रही है।”

— पीटीआई

श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज़

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