विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनने के लिए हर साल 2035 तक 365 अरब डॉलर की जरूरत: संयुक्त राष्ट्र

नई दिल्ली, 29 अक्टूबर (PTI) एक नए संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट में बुधवार को कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्प्रभावों से निपटने के लिए विकासशील देशों को 2035 तक हर साल 365 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता होगी, लेकिन संवेदनशील समुदायों की रक्षा के लिए भेजी जाने वाली वित्तीय सहायता लगातार कम हो रही है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की अडैप्टेशन गैप रिपोर्ट 2025 के अनुसार अमीर देशों की ओर से अनुकूलन वित्त (Adaptation Finance) में कमी दर्ज की गई है, जबकि वे बार-बार समर्थन बढ़ाने का वादा कर चुके हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, मॉडल आधारित अनुमान के मुताबिक विकासशील देशों को 2035 तक हर साल 310 अरब डॉलर की जरूरत होगी और यदि उनके राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) और राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं (NAPs) में बताए गए वास्तविक आवश्यकताओं को आधार बनाया जाए तो यह राशि 365 अरब डॉलर वार्षिक हो जाती है।

हालांकि, 2023 में अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त सिर्फ 26 अरब डॉलर रहा, जो 2022 के 28 अरब डॉलर से भी कम है। इस तरह वर्तमान वित्तपोषण आवश्यक राशि से लगभग 12 से 14 गुना कम है।

सतात संपदा क्लाइमेट फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक और जलवायु कार्यकर्ता हरजीत सिंह ने कहा,

“आज 172 देशों के पास अनुकूलन योजनाएं हैं, लेकिन अमीर देशों ने केवल खोखले वादे किए हैं और पिछले वर्ष वित्तीय प्रवाह और भी घट गया।”

उन्होंने कहा, “यह भारी अंतर, जो अब उपलब्ध राशि से कम से कम 12 गुना है, जान-माल की भारी क्षति और तबाह होती आजीविकाओं की सीधी वजह बना है।”

रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2025 तक 2019 के स्तर से अनुकूलन वित्त को दोगुना करने का ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट लक्ष्य हासिल नहीं होगा।

रिपोर्ट ने यह भी कहा कि बाकू, अज़रबैजान में COP29 में तय किया गया जलवायु वित्त का नया सामूहिक लक्ष्य इतनी महत्वाकांक्षा नहीं रखता जिससे आवश्यकता और उपलब्धता के बीच मौजूद भारी अंतर को भरा जा सके।

वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में सबसे कम योगदान देने के बावजूद एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई विकासशील देश बाढ़, सूखे और बढ़ती गर्मी के गंभीर प्रभावों का सबसे ज्यादा सामना कर रहे हैं।

रिपोर्ट का कहना है कि यदि विकसित देश अपनी वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी नहीं करते तो इन क्षेत्रों को अनुकूलन की बढ़ती लागत अपने दम पर वहन करनी पड़ेगी।

हालांकि, रिपोर्ट ने योजना और क्रियान्वयन में हो रही प्रगति की भी सराहना की। अब अधिकांश देशों के पास कम से कम एक राष्ट्रीय अनुकूलन नीति, रणनीति या योजना मौजूद है और इसे राष्ट्रीय विकास योजनाओं में शामिल करने के प्रयास बेहतर हो रहे हैं।

देशों ने जैव विविधता, कृषि, जल और बुनियादी ढांचे पर केंद्रित 1,600 से अधिक अनुकूलन कार्रवाइयों की सूचना भी दी है।

ग्रीन क्लाइमेट फंड, ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी और अडैप्टेशन फंड जैसे बहुपक्षीय जलवायु कोषों के जरिए वित्तीय सहयोग 2024 में बढ़ा है। हालांकि UNEP ने चेतावनी दी कि बढ़ती आर्थिक चुनौतियाँ भविष्य की प्रगति को सीमित कर सकती हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि अनुकूलन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के वित्त में भारी बढ़ोतरी आवश्यक है। अनुमान है कि उचित नीति उपायों और मिश्रित वित्त (blended finance) के सहयोग से निजी क्षेत्र 2035 तक हर साल लगभग 50 अरब डॉलर का योगदान दे सकता है।

रिपोर्ट ने यह भी सचेत किया कि कमजोर देशों में अनुकूलन परियोजनाओं के लिए ऋण के रूप में वित्त देने की बढ़ती प्रवृत्ति खतरनाक है, क्योंकि गैर-रियायती ऋण (non-concessional debt) का बढ़ता बोझ असमानताओं को और गहरा कर सकता है और देशों को जलवायु संबंधी कर्ज के जाल में फंसा सकता है।

UNEP ने कहा कि यदि दुनिया को जलवायु आघातों से जीवन, आजीविका और अर्थव्यवस्थाओं की रक्षा करनी है तो वैश्विक अनुकूलन वित्त में तेज़ी से वृद्धि करनी होगी और बोझ उन पर नहीं पड़ना चाहिए जिनका संकट पैदा करने में सबसे कम योगदान रहा है। PTI GVS ZMN

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