नई दिल्ली, 2 जुलाई (पीटीआई) — दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को 2023 संसद सुरक्षा उल्लंघन मामले के दो आरोपियों को जमानत देते हुए कहा कि उनका विरोध प्रदर्शन आतंकवादी कृत्य नहीं था, बल्कि यह अधिक प्रतीकात्मक और “राजनीतिक असहमति” का मामला था।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और हरिश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने नीलम आज़ाद और महेश कुमावत को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों पर जमानत दी, साथ ही उन्हें मीडिया या सोशल मीडिया पर इस घटना के बारे में बात करने से भी मना किया।
पीठ ने यह भी नोट किया कि घटना के समय कुमावत दिल्ली में नहीं थे और आज़ाद संसद भवन के अंदर नहीं थीं।
कोर्ट ने कहा, “संसद हमारे लोकतंत्र की नींव है। यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपियों ने जो किया वह विरोध या प्रदर्शन का वैध रूप था। साथ ही, अपीलकर्ताओं ने ऐसा कोई आंदोलन नहीं चलाया जिसे राष्ट्र के हित के खिलाफ कहा जा सके। इनकी गतिविधियां विचारधारात्मक संदेश फैलाने की हैं और अदालत की राय में यह आतंकवादी कृत्य नहीं है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि यह विरोध “अधिक प्रतीकात्मक था, न कि किसी गंभीर खतरे या आतंकवादी मंशा के साथ किया गया था। यह मामला इस स्तर पर विरोध और राजनीतिक असहमति का है। भले ही विरोध का तरीका और स्थान अत्यंत निंदनीय है, फिर भी जमानत के मुद्दे पर UAPA की धाराएं लागू नहीं होतीं।”
पीठ ने यह भी कहा कि जिन स्मोक कैनिस्टर्स का इस्तेमाल हुआ, अगर उनमें कोई घातक या गंभीर चोट पहुंचाने वाला पदार्थ होता, तो वे बाजार में खुलेआम उपलब्ध नहीं होते।
“कोर्ट न्यायिक संज्ञान ले सकती है कि ऐसे कैनिस्टर्स आईपीएल, क्रिकेट मैचों और शादियों, पार्टियों, होली आदि में भी इस्तेमाल होते हैं। केवल पीले धुएं वाले कैनिस्टर्स का इस्तेमाल अपीलकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिक दृष्टया मामला नहीं बनाता। क्या वे कैनिस्टर्स विस्फोटक हो सकते थे या नहीं, यह ट्रायल में तय होगा।”
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह लगे कि आरोपियों ने देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने की मंशा से यह कृत्य किया या लोगों में आतंक फैलाने का प्रयास किया।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार, आज़ाद संसद के बाहर थीं, उन्होंने स्मोक कैनिस्टर खोला लेकिन अंदर जाने से इनकार किया, और कुमावत दिल्ली में मौजूद नहीं थे और उन्होंने कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे UAPA की धारा 15 (आतंकवादी कृत्य) या 18 (षड्यंत्र, प्रयास, उकसावे) लागू हो।
कोर्ट ने कहा, “इस स्तर पर जीवन, शारीरिक चोट या संपत्ति को नुकसान का कोई सबूत नहीं है। लोकसभा सचिवालय के बयान के अनुसार, घटना में किसी को चोट नहीं आई और आज़ाद ने कोई ऐसा कृत्य नहीं किया जिससे जान-माल का नुकसान हो सकता था।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही तारीख ऐसी चुनी गई जब खतरे की आशंका थी, लेकिन अभी के लिए यह कहा जा सकता है कि इस घटना का उद्देश्य लोगों का ध्यान आकर्षित करना और प्रचार पाना था।
हालांकि, केवल इस आधार पर कोर्ट जमानत देने से इनकार नहीं कर सकती।
आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट के जमानत अर्जी खारिज होने के आदेश को चुनौती दी थी।
घटना के दिन कुछ आरोपियों ने लोकसभा में स्मोक कैनिस्टर चलाए और नारेबाजी की थी, जबकि दो अन्य ने संसद परिसर के बाहर रंगीन धुआं छोड़ा और “तानाशाही नहीं चलेगी” के नारे लगाए थे।

