सरकार जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विचार कर रही है

नई दिल्ली, 27 मई: केंद्र सरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह कदम उनके सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने और सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जांच समिति द्वारा आरोप सिद्ध किए जाने के बाद उठाया जा रहा है।

मौजूदा जानकारी के अनुसार, यदि जस्टिस वर्मा खुद इस्तीफा नहीं देते हैं, तो जुलाई के दूसरे हिस्से में शुरू होने वाले मानसून सत्र में संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना सरकार के लिए स्वाभाविक विकल्प है। घटना के समय वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में तैनात थे, लेकिन विवाद के बाद उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति ने आरोपों की पुष्टि की है। समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसमें जली हुई नकदी की तस्वीरें और वीडियो शामिल हैं। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को वर्मा के महाभियोग की सिफारिश करते हुए पत्र लिखा था। खन्ना ने वर्मा को इस्तीफा देने के लिए भी कहा था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अभी तक कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। वर्मा ने खुद को निर्दोष बताया है और जली हुई नकदी से किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया है।

सरकार विपक्षी दलों से भी बातचीत कर रही है ताकि प्रस्ताव को सर्वसम्मति से आगे बढ़ाया जा सके। अंतिम निर्णय जल्द लिया जाएगा, क्योंकि इतनी बड़ी घटना को नजरअंदाज करना मुश्किल है।

महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में लाया जा सकता है। राज्यसभा में कम से कम 50 और लोकसभा में 100 सदस्यों के हस्ताक्षर जरूरी हैं। प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद, संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद् की जांच समिति गठित करेंगे। यह समिति आरोपों की जांच करेगी।

यह मामला भारत में न्यायिक जवाबदेही और कार्यपालिका-न्यायपालिका के संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।