सीपीआई(एमएल) महासचिव ने कहा: आगामी चुनावों में मतदाता सूची संशोधन सबसे अहम मुद्दा, विरोध की आशंका

बिहार में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को विपक्षी दलों ने ‘वोट-बंदी’ करार दिया है और सीपीआई(एमएल) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने शुक्रवार को कहा कि यह आगामी विधानसभा चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बनने जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हो सकते हैं।

भट्टाचार्य ने कहा कि SIR के खिलाफ विरोध 9 जुलाई को श्रम संहिता और अन्य मुद्दों के खिलाफ होने वाली हड़ताल का हिस्सा होंगे और आगे भी आंदोलन जारी रहेंगे।

इस प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर दस्तावेज़ों के आधार पर मतदाताओं का सत्यापन कर रहे हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य योग्य मतदाताओं को जोड़ना और अयोग्य नामों को हटाना है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और चुनावी सूची त्रुटिरहित हो।

लेकिन विपक्ष का आरोप है कि यह कवायद लाखों वास्तविक मतदाताओं—खासकर गरीबों, प्रवासी मजदूरों और हाशिए के लोगों—को सूची से बाहर कर सकती है। कांग्रेस और अन्य दलों ने इसे राज्य मशीनरी के जरिए “जानबूझकर बहिष्कार” का खतरा बताया है।

नई सूची के लिए दस्तावेज़ी प्रमाण की मांग की जा रही है:

  1. 1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे लोगों को अपने लिए दस्तावेज़ देना होगा
  2. 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे लोगों को अपने और एक अभिभावक के दस्तावेज़
  3. 2 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे लोगों को अपने और दोनों अभिभावकों के दस्तावेज़ देने होंगे

भट्टाचार्य ने कहा, “संविधान खतरे में है” की बहस अब हर घर तक पहुंच गई है और अब लोग समझ रहे हैं कि मतदान अधिकार क्यों जरूरी है। उन्होंने कहा कि SIR पर बिना दलों से सलाह लिए फैसला लेना “सर्जिकल स्ट्राइक” जैसा है और बिहार के लोग इससे आक्रोशित हैं।

उन्होंने कहा कि प्रवासी मजदूरों और असंगठित कामगारों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, क्योंकि “सामान्य निवासी” (ordinarily resident) की शर्त उनके लिए अव्यावहारिक है।

भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया “जनवंचना” (mass disenfranchisement) की ओर ले जा सकती है और चुनाव आयोग नागरिकता पर ही संदेह कर रहा है। उन्होंने पूछा, “क्या यह दो तरह के नागरिक बनाने की कोशिश है?”

एनडीए सहयोगी दलों के विरोध न करने पर भी उन्होंने आश्चर्य जताया।

चुनाव आयोग ने दावा किया है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी है और किसी भी योग्य मतदाता को बाहर नहीं किया जाएगा। लेकिन विपक्ष का कहना है कि इतनी कम समय सीमा में, इतनी बड़ी आबादी की सूची तैयार करना व्यावहारिक नहीं है और इससे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो सकता है।