
नई दिल्ली, 10 जुलाई (पीटीआई): सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के तहत मतदाता सूची अद्यतन की प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी और इसे “संवैधानिक दायित्व” बताया।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने हालांकि इस प्रक्रिया के समय पर सवाल उठाए और कहा कि “हम प्रारंभिक दृष्टिकोण से मानते हैं कि आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड और राशन कार्ड को बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान स्वीकार किया जाना चाहिए।”
पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं, जिनमें 10 विपक्षी दलों के नेता शामिल हैं, ने इस प्रक्रिया पर अंतरिम रोक की मांग नहीं की है। अदालत ने इन याचिकाओं पर निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा और अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की।
निर्वाचन आयोग को 21 जुलाई तक याचिकाओं पर काउंटर हलफनामा दाखिल करने और 28 जुलाई तक प्रत्युत्तर दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
पीठ ने कहा कि वह चुनाव आयोग की नीयत और ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रही है, लेकिन इस प्रक्रिया के समय को लेकर संदेह जरूर है। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी से कहा, “हम आपकी ईमानदारी पर संदेह नहीं कर रहे, लेकिन धारणाएं बन रही हैं। यह एक संवैधानिक दायित्व है, इसलिए हम इसे रोकने के बारे में नहीं सोच रहे हैं।”
द्विवेदी ने अदालत को बताया कि अब तक 60% मतदाताओं ने अपनी पहचान सत्यापित कर ली है और आश्वासन दिया कि किसी भी मतदाता का नाम सूची से बिना सुनवाई के नहीं हटाया जाएगा।
पीठ ने कहा, “हम एक संवैधानिक निकाय को उसके कर्तव्य से नहीं रोक सकते, लेकिन साथ ही हम उसे ऐसा कुछ भी नहीं करने देंगे जो वह करने के लिए अधिकृत नहीं है।”
दिन की शुरुआत में पीठ ने चुनाव आयोग से बिहार में आगामी चुनावों के मद्देनजर इस विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के समय पर सवाल किए और कहा कि यह लोकतंत्र की जड़ और मतदान के अधिकार से जुड़ा हुआ है। साथ ही उन्होंने यह तर्क भी खारिज किया कि चुनाव आयोग को इस तरह की प्रक्रिया का अधिकार नहीं है।
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार कार्ड “नागरिकता का प्रमाण नहीं है”। इस पर पीठ ने पूछा कि बिहार में चल रहे पुनरीक्षण अभियान में आधार कार्ड को क्यों शामिल नहीं किया गया। पीठ ने कहा कि नागरिकता का निर्धारण गृह मंत्रालय का विषय है, न कि चुनाव आयोग का।
द्विवेदी ने अनुच्छेद 326 का हवाला देते हुए कहा कि हर मतदाता को भारतीय नागरिक होना चाहिए और “आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है”। इस पर न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा, “अगर आपको बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नागरिकता जांचनी है, तो यह काम आपको पहले करना चाहिए था, अब थोड़ी देर हो गई है।”
पीठ ने यह भी खारिज कर दिया कि चुनाव आयोग को ऐसी किसी प्रक्रिया का अधिकार नहीं है, और कहा कि यह संविधान में निहित है, भले ही पिछली बार ऐसा कोई अभियान 2003 में हुआ हो।
याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए तीन मुख्य सवालों का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि यह अभियान लोकतंत्र की जड़ों और मतदान के अधिकार से जुड़ा है और चुनाव आयोग को इन सवालों का उत्तर देना होगा।
द्विवेदी ने कहा कि समय के साथ मतदाता सूचियों को अद्यतन करने की आवश्यकता होती है, और SIR एक ऐसा ही माध्यम है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर चुनाव आयोग मतदाता सूची को अद्यतन नहीं करेगा तो फिर कौन करेगा?
हालाँकि आयोग ने शीर्ष अदालत को आश्वासन दिया कि किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर दिया जाएगा।
सुनवाई की शुरुआत में ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ नामक एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि इस विशेष गहन पुनरीक्षण में लगभग 7.9 करोड़ नागरिक शामिल होंगे, लेकिन अभी तक मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज नहीं माना गया है।
अब तक सुप्रीम कोर्ट में 10 से अधिक याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें मुख्य याचिका ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ की है।
इसके अलावा राजद सांसद मनोज झा, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल, एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले, सीपीआई के डी. राजा, सपा के हरिंदर सिंह मलिक, शिवसेना (उद्धव) के अरविंद सावंत, झामुमो के सरफराज अहमद और भाकपा (माले) के दीपंकर भट्टाचार्य ने भी सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए याचिकाएं दायर की हैं।
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