नई दिल्ली, 5 जुलाई (पीटीआई) — राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने शनिवार को कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच रिपोर्ट का “कोई संवैधानिक महत्व नहीं” है क्योंकि किसी भी जांच की प्रक्रिया केवल जजेज इंक्वायरी एक्ट के तहत ही हो सकती है।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिब्बल ने सरकार पर जस्टिस शेखर यादव को बचाने का भी आरोप लगाया और राज्यसभा सचिवालय से यह सवाल किया कि जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए उनके हस्ताक्षर की सत्यापन प्रक्रिया के लिए उनसे संपर्क क्यों किया गया।
जस्टिस वर्मा मामले पर सिब्बल ने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत, अगर राज्यसभा के 50 सदस्य या लोकसभा के 100 सदस्य महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस देते हैं, तो जजेज इंक्वायरी एक्ट के तहत एक जांच समिति गठित की जाती है।” केवल संसद के पास ही ऐसी समिति गठित करने का अधिकार है।
उन्होंने कहा कि संसद कानून बना सकती है, उसी कानून के तहत जांच होगी, और जांच के बाद ही किसी जज के दुराचार या अक्षमता पर निर्णय लिया जा सकता है। दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में महाभियोग प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत से पारित करना होता है।
सिब्बल ने कहा, “संविधान किसी भी इन-हाउस प्रक्रिया को मान्यता नहीं देता। आप किस आधार पर कह रहे हैं कि जस्टिस वर्मा दोषी हैं? मंत्री इस तरह की टिप्पणियां कर रहे हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि संसद के नियमों के अनुसार महाभियोग का प्रस्ताव सदस्यों द्वारा लाया जाता है, न कि सरकार द्वारा। “सरकार कैसे कह सकती है कि ‘मैं प्रस्ताव लाऊंगा’? सरकार इन-हाउस प्रक्रिया पर भरोसा नहीं कर सकती, जिसका अनुच्छेद 124 से कोई संबंध नहीं है।”
सिब्बल ने कहा कि न तो सरकार और न ही संसद का कोई सदस्य उस रिपोर्ट के आधार पर कोई निष्कर्ष निकाल सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में इन-हाउस प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन अब तक जितने भी महाभियोग प्रस्ताव आए, उनकी रिपोर्ट कभी भी सरकार को नहीं भेजी गई। “तो फिर इस मामले में इन-हाउस रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों की गई, जब पहले ऐसा नहीं हुआ था?” उन्होंने सवाल किया।
मार्च में दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहते हुए जस्टिस वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना के बाद उनके ओउटहाउस में जली हुई नोटों की कई बोरियां मिली थीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति ने कई गवाहों से बात कर और जस्टिस वर्मा का बयान दर्ज कर उन्हें दोषी ठहराया था। इसके बाद उन्हें उनके मूल कोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है।
सिब्बल के ये बयान ऐसे समय आए हैं जब संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि प्रमुख विपक्षी दलों ने वर्मा को हटाने के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए सैद्धांतिक सहमति दे दी है और जल्द ही हस्ताक्षर जुटाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
जजेज इंक्वायरी एक्ट, 1968 के अनुसार, किसी भी सदन में जज को हटाने का प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद, स्पीकर या चेयरमैन तीन सदस्यीय समिति गठित करते हैं, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के जज, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश और एक “प्रतिष्ठित विधिवेत्ता” शामिल होते हैं।
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