
बैंकॉक, 4 फरवरी (एपी) म्यांमार में सेना समर्थित पार्टी को चुनाव में विजेता घोषित किया गया है। बुधवार को जारी आधिकारिक नतीजों के साथ ही देश के सेना प्रमुख ने एक ऐसे नए सलाहकार निकाय को अधिकृत करने वाला कानून भी मंज़ूर किया है, जिससे वह नई सरकार का औपचारिक नेतृत्व किए बिना भी प्रभाव बनाए रख सकें।
पूर्व जनरलों के नेतृत्व वाली यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) की जीत पहले से ही लगभग तय मानी जा रही थी, क्योंकि इस चुनाव से प्रमुख विपक्षी दलों को बाहर रखा गया था और असहमति की आवाज़ों पर कड़ी पाबंदियाँ थीं।
संविधान के तहत संसद की 25 प्रतिशत सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं, जिससे सशस्त्र बलों और उनसे जुड़े दलों का वर्चस्व सुनिश्चित हो जाता है।
सैन्य सरकार के प्रमुख सीनियर जनरल मिन आंग ह्लाइंग के नए संसद के गठन के बाद राष्ट्रपति बनने की संभावना जताई जा रही थी। हालांकि, संविधान राष्ट्रपति को सेना प्रमुख (कमांडर-इन-चीफ) के पद पर बने रहने की अनुमति नहीं देता — जो देश का सबसे शक्तिशाली पद माना जाता है। ऐसे में यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या वह यह पद छोड़ेंगे।
बुधवार को इस संभावना को और बल मिला जब मिन आंग ह्लाइंग ने एक नए “यूनियन कंसल्टेटिव काउंसिल” के गठन को अधिकृत करने वाले कानून पर हस्ताक्षर किए। यह निकाय अपने अध्यक्ष को बिना औपचारिक सत्ता संभाले भी प्रभाव बनाए रखने का अवसर दे सकता है।
सरकारी अख़बार ‘म्यांमार अलिन’ में प्रकाशित कानून के अनुसार, नया राष्ट्रपति कम से कम पाँच सदस्यों वाली इस परिषद का गठन कर सकता है, जिसमें एक अध्यक्ष भी होगा। परिषद को राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश संबंध, शांति प्रक्रिया और कानून निर्माण पर सलाह और समन्वय का अधिकार होगा, हालांकि इससे कार्यपालिका या न्यायपालिका की शक्तियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
यह कदम 2021 में आंग सान सू ची के नेतृत्व वाली निर्वाचित सरकार से सत्ता छीनने के बाद से सेना द्वारा समानांतर संस्थाओं के इस्तेमाल की रणनीति को दर्शाता है। उस सैन्य तख्तापलट के बाद देश में व्यापक अशांति और सशस्त्र प्रतिरोध शुरू हुआ, जो अब गृहयुद्ध का रूप ले चुका है।
यह अभी स्पष्ट नहीं है कि मिन आंग ह्लाइंग स्वयं इस परिषद का नेतृत्व करेंगे या नहीं। परिषद की घोषणा ऐसे समय में की गई है, जब म्यांमार में पाँच वर्षों बाद हुए पहले चुनाव के अंतिम नतीजे जारी किए गए।
दिसंबर और जनवरी में तीन चरणों में हुए मतदान में देश के 330 में से 263 टाउनशिप में वोटिंग हुई। शेष लगभग एक-पाँचवां हिस्सा संघर्ष के कारण मतदान से वंचित रहा।
यूनियन इलेक्शन कमीशन के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, USDP ने राष्ट्रीय संसद की कुल 586 सीटों में से 339 सीटें जीतीं। संविधान के तहत सेना को स्वतः 166 सीटें मिलती हैं। इस तरह दोनों के पास मिलकर 505 सीटें, यानी लगभग 86 प्रतिशत बहुमत है। अन्य 21 दलों को एक से 20 सीटों के बीच जीत मिली।
‘म्यांमार अलिन’ की रिपोर्ट के अनुसार, मिन आंग ह्लाइंग ने मंगलवार को वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक में कहा कि USDP को देशभर में 44 प्रतिशत से अधिक वोट मिले। उन्होंने बताया कि 24 मिलियन से अधिक पात्र मतदाताओं में से करीब 13 मिलियन (लगभग 54 प्रतिशत) ने मतदान किया और इसे उन्होंने जनता की उत्साहपूर्ण भागीदारी बताया।
अख़बार की एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया कि उन्होंने मंगलवार को राजधानी नेपीडॉ में रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु से मुलाकात के दौरान बताया कि संसद मार्च के तीसरे सप्ताह में नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए बैठक करेगी।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टुर्क ने शुक्रवार को सैन्य तख्तापलट की बरसी पर जारी बयान में कहा कि यह चुनाव मौलिक अधिकारों का सम्मान करने में विफल रहा और इस प्रक्रिया ने केवल हिंसा और सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ाया है।
उन्होंने कहा कि पूरे देश में मतदाता दबाव की खबरें आईं, जिनमें जबरन भर्ती, खाद्य आपूर्ति रोके जाने और प्रशासनिक दंड का डर शामिल है।
“पिछले पाँच वर्षों से सैन्य शासन राजनीतिक असहमति के दमन, बड़े पैमाने पर मनमानी गिरफ्तारियों, जबरन भर्ती, व्यापक निगरानी और नागरिक अधिकारों के सीमित होने से पहचाना जा रहा है,” टुर्क ने कहा।
“अब सेना लोगों को जबरन मतदान के लिए मजबूर कर हिंसा के ज़रिये अपने शासन को मजबूत करना चाहती है। यह नागरिक शासन से बिल्कुल विपरीत है।”
