हर साल 3.5 करोड़ टन तक मछली बर्बाद: अध्ययन

Chikkamagaluru: A man displays fish after fishing, ahead of the presentation of the Union Budget 2026-27 by Union Finance Minister Nirmala Sitharaman, near Chikkamagaluru, Karnataka, Saturday, Jan. 31, 2026. (PTI Photo)(PTI01_31_2026_000252B)

कोच्चि/पुडुचेरी, 12 फरवरी (पीटीआई) समुद्री मत्स्य क्षेत्र में बुनियादी ढांचे की कमियों के कारण वैश्विक स्तर पर हर साल 2.5 से 3.5 करोड़ टन मछली बर्बाद हो जाती है। यह खुलासा एक नवीनतम अध्ययन में हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और बे ऑफ बंगाल प्रोग्राम इंटर-गवर्नमेंटल ऑर्गनाइजेशन (बीओबीपी-आईजीओ) के संयुक्त अध्ययन में पाया गया कि विकासशील देशों में कुल उत्पादन का 20 से 35 प्रतिशत हिस्सा मछली हानि और बर्बादी के रूप में चला जाता है।

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में यह नुकसान 75 प्रतिशत तक है, जो पोषण सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है।

इन निष्कर्षों को गुरुवार को पुडुचेरी में आयोजित बे ऑफ बंगाल क्षेत्र में समुद्री मत्स्य मूल्य श्रृंखला पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में प्रस्तुत किया गया।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि एशिया में कटाई के बाद मछली की हानि एक “मूक संकट” के रूप में उभर रही है, जहां जलीय खाद्य मूल्य श्रृंखला के विभिन्न चरणों में कुल पकड़ का 20 से 60 प्रतिशत तक नुकसान हो रहा है, जिससे खाद्य सुरक्षा और मछुआरों की आय पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।

यह अध्ययन 2025–26 के दौरान भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम सहित 11 एशियाई देशों में किया गया और इसमें समुद्री मत्स्य क्षेत्र में प्रणालीगत कमियों को उजागर किया गया।

निष्कर्षों के अनुसार, कुल हानि का 43.5 प्रतिशत हिस्सा लैंडिंग स्थलों पर अपर्याप्त बर्फ उपलब्धता और उच्च तापमान के कारण होता है।

बीओबीपी-आईजीओ के निदेशक डॉ. पी. कृष्णन, जिन्होंने कार्यशाला में रिपोर्ट प्रस्तुत की, ने कहा कि बे ऑफ बंगाल क्षेत्र में लैंडिंग केंद्रों पर कोल्ड स्टोरेज की कमी, अपर्याप्त आइस प्लांट, कमजोर कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स, तथा प्रसंस्करण और पैकेजिंग प्रणालियों की कमजोरी जैसी अवसंरचनात्मक और संस्थागत खामियां प्रमुख कारण हैं।

विज्ञप्ति के अनुसार, यह वैश्विक कार्यशाला बीओबीपी-आईजीओ और पुडुचेरी सरकार द्वारा एफएओ, आईसीएआर–केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड और एनवायरनमेंटल डिफेंस इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित की जा रही है।

कृष्णन ने कहा कि जहां उत्पादन और निष्कर्षण में सार्वजनिक निवेश अधिक है, वहीं कटाई के बाद प्रबंधन में निवेश बहुत कम है और बाजार तक पहुंच की प्रणाली कमजोर बनी हुई है।

उन्होंने कहा, “मूल्य श्रृंखला के मध्य चरणों की उपेक्षा और निजी निवेश की कमी नुकसान को और बढ़ा देती है।”

अध्ययन में मछुआरों को “कीमत स्वीकार करने वाले” से “मूल्य निर्माता” बनाने के लिए व्यापक मूल्य श्रृंखला उन्नयन का आह्वान किया गया है।

मुख्य सिफारिशों में बेड़े प्रबंधन की योजना, सार्वजनिक अवसंरचना का आधुनिकीकरण (विशेषकर लैंडिंग केंद्रों पर कोल्ड स्टोरेज और बर्फ उत्पादन), अनिवार्य ट्रेसबिलिटी प्रणाली, नाव पर ही प्रसंस्करण और संरक्षण तकनीक, तथा मछली पकड़ने वाले जहाजों और प्रसंस्करण उद्योग के बीच बेहतर समन्वय शामिल हैं।

नॉर्वे और आइसलैंड की प्रथाओं का उल्लेख करते हुए कृष्णन ने कहा कि वहां पूर्ण ट्रेसबिलिटी, उच्च मूल्य प्रसंस्करण और मछली बायोमास के पूर्ण उपयोग के माध्यम से कटाई के बाद होने वाला नुकसान 5 प्रतिशत से भी कम कर दिया गया है।

उन्होंने कहा, “भारत और बे ऑफ बंगाल के अन्य देशों में समान परिणाम हासिल करने के लिए तकनीकी अपनाने और नीतिगत समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है।” PTI HMP SSK