2021 से अब तक असोला-भट्टी में करीब 10,000 जंगली जानवरों का पुनर्वास, सूची में बंदर सबसे ऊपर

Varanasi: Monkeys bask in the winter sun, in Varanasi, Wednesday, Jan. 14, 2026. (PTI Photo) (PTI01_14_2026_000352B)

नई दिल्ली, 16 जनवरी (पीटीआई) भीड़भाड़ वाले इलाकों से हटाए गए बंदरों से लेकर मानव बस्तियों से बचाए गए सांपों और पक्षियों तक, 2021 से 2025 के बीच दिल्ली के असोला-भट्टी वन्यजीव अभयारण्य में कुल मिलाकर 10,000 से अधिक जंगली जानवरों का रेस्क्यू और पुनर्वास किया गया है। यह जानकारी आधिकारिक आंकड़ों में सामने आई है।

इन संचयी आंकड़ों में 2021 से 2025 के बीच नागरिक एजेंसियों द्वारा संभाले गए 6,691 रीसस मकाक (बंदर) और 2021 से 2024 के बीच गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा विभिन्न प्रजातियों के 3,339 जंगली जानवरों का पुनर्वास शामिल है।

बंदरों के पुनर्वास का कार्य नगर निगम दिल्ली (एमसीडी) द्वारा किया गया, जबकि एनजीओ के आंकड़ों में मानव बस्तियों से बचाए गए सांप, पक्षी और छोटे स्तनधारी शामिल हैं, जिन्हें उपचार के बाद पुनर्वास और मुक्त किया गया। दोनों ही प्रक्रियाओं का अधिकांश हिस्सा असोला-भट्टी वन्यजीव अभयारण्य के माध्यम से किया गया।

नागरिक रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि इस अभयारण्य में बंदरों का पुनर्वास एक दशक से अधिक समय से जारी है। 10 फरवरी 2021 से पहले ही 23,263 बंदरों को असोला-भट्टी भेजा जा चुका था, जिससे वर्षों में यहां पुनर्वासित बंदरों की कुल संख्या 29,854 हो गई है।

इसके विपरीत, एनजीओ के आंकड़ों में विभिन्न प्रजातियों के पुनर्वास में साल-दर-साल भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। 2021 में 266 जानवरों के बाद यह संख्या 2022 में बढ़कर 2,067 हो गई, फिर 2023 में घटकर 387 रह गई और 2024 में दोबारा बढ़कर 619 हो गई।

इन पुनर्वासों में सबसे बड़ा हिस्सा सांपों का रहा, इसके बाद पक्षी और छोटे स्तनधारी रहे। एनजीओ द्वारा संभाले गए सरीसृपों में इंडियन स्पेक्टेकल्ड कोबरा सबसे बड़ी श्रेणी के रूप में उभरा, जिनका 2021 से 2024 तक हर साल रेस्क्यू दर्ज किया गया। रैट स्नेक और वुल्फ स्नेक भी अक्सर पाए गए, जबकि इंडियन रॉक पायथन कम संख्या में लेकिन हर साल दर्ज हुए। इस अवधि में क्रेट, सैंड बोआ और मॉनिटर लिज़र्ड के अलावा कभी-कभार कछुए, साही और छोटे पक्षियों के रेस्क्यू भी दर्ज किए गए।

पुनर्वास प्रक्रिया से अलग, दिल्ली वन विभाग के दक्षिणी डिवीजन के रेस्क्यू रिकॉर्ड बताते हैं कि जनवरी 2022 से अगस्त 2025 के बीच दिल्ली में संकट की स्थिति से 2,290 से अधिक जानवरों को बचाया गया। ये आंकड़े केवल आपातकालीन रेस्क्यू से संबंधित हैं और इनमें दीर्घकालिक पुनर्वास शामिल नहीं है।

इस अवधि में सबसे अधिक रेस्क्यू बंदरों के हुए, जो कुल मामलों का लगभग 50 प्रतिशत रहे। इसके बाद रैट स्नेक, चील और ब्लैक काइट, मॉनिटर लिज़र्ड और इंडियन रॉक पायथन का स्थान रहा।

साल-दर-साल आंकड़ों के अनुसार, 2022 में 397 जानवरों का रेस्क्यू किया गया, 2023 में 522, 2024 में 804 और जनवरी से अगस्त 2025 के बीच करीब 575 जानवरों को बचाया गया।

2022 में लगभग 214 बंदरों का रेस्क्यू हुआ, जो उस वर्ष के कुल मामलों का करीब 54 प्रतिशत था। इसके बाद लगभग 36 रैट स्नेक और करीब 31 चील एवं ब्लैक काइट थे, जबकि मॉनिटर लिज़र्ड और इंडियन रॉक पायथन का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रहा।

रेस्क्यू के प्रमुख कारणों में 164 चोट के मामले, 61 जानवरों का इमारतों या पेड़ों से गिरना, 47 मामलों में तारों या संरचनाओं में फंसना और 39 करंट लगने की घटनाएं शामिल थीं। संगम विहार, असोला, भट्टी माइंस और नेब सराय प्रमुख रेस्क्यू स्थल रहे।

2023 में रेस्क्यू की संख्या बढ़कर लगभग 522 हो गई, जिनमें करीब 276 बंदर थे—जो कुल मामलों का लगभग 53 प्रतिशत थे। इसके बाद 52 रैट स्नेक और 47 चील व ब्लैक काइट रहे। उस वर्ष 211 चोट के मामले, 84 गिरने की घटनाएं, 66 फंसने के मामले और 58 करंट लगने की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें दक्षिण दिल्ली के वही इलाके प्रमुख रहे।

सबसे अधिक रेस्क्यू 2024 में दर्ज किए गए, जब वन विभाग ने करीब 804 जानवरों को संभाला। इनमें 398 बंदर, 92 रैट स्नेक और 83 चील व ब्लैक काइट शामिल थे। कारणों में 326 चोट के मामले, 132 गिरने की घटनाएं, 109 फंसने के मामले और 136 करंट लगने की घटनाएं शामिल थीं। भट्टी माइंस, संगम विहार, असोला और नेब सराय फिर से हॉटस्पॉट रहे।

जनवरी से अगस्त 2025 के बीच करीब 575 जानवरों का रेस्क्यू किया गया, जिनमें लगभग 271 बंदर थे—जो करीब 47 प्रतिशत रहे। इसके बाद 78 रैट स्नेक और 56 चील व ब्लैक काइट रहे, जबकि मॉनिटर लिज़र्ड और इंडियन रॉक पायथन की संख्या कम लेकिन स्थिर रही।

समान अवधि की तुलना से पता चला कि जनवरी से अगस्त 2024 के दौरान लगभग 689 रेस्क्यू की तुलना में 2025 की समान अवधि में यह संख्या घटकर करीब 575 रह गई—यानी 114 मामलों या 16.5 प्रतिशत की कमी।

सभी वर्षों में चोट रेस्क्यू का प्रमुख कारण बनी रही, जबकि करंट लगने की घटनाएं दिल्ली के शहरी-वन्य क्षेत्र के संपर्क क्षेत्रों में वन्यजीवों के लिए एक गंभीर और लगातार खतरा बनी रहीं।

आंकड़ों में मौसमी प्रवृत्ति भी स्पष्ट दिखी—मई और जून में बंदरों और पक्षियों के रेस्क्यू अधिक हुए, जबकि जुलाई और अगस्त में रैट स्नेक, इंडियन रॉक पायथन और मॉनिटर लिज़र्ड के रेस्क्यू ज्यादा दर्ज किए गए।

रिकॉर्ड में नीलगाय (ब्लू बुल) जैसे बड़े जानवरों के बार-बार रेस्क्यू भी दर्ज हैं। 2022 से अगस्त 2025 के बीच ऐसे 100 से अधिक मामले सामने आए, जो अधिकतर रिहायशी इलाकों और वन-सीमा वाले क्षेत्रों से थे