नई दिल्ली, 12 जून (पीटीआई)
दिल्ली की एक अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के एक मामले में 12 आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया है, जबकि एक आरोपी लोकेश सोलंकी को धर्म के आधार पर वैमनस्य फैलाने और सार्वजनिक शरारत के लिए दोषी ठहराया है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमाचला ने अपने फैसले में कहा कि हत्या के मामले में प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्य “टुकड़ों और अपूर्ण” हैं, जो आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त नहीं हैं।
अदालत ने पाया कि लोकेश सोलंकी “कट्टर हिंदू एकता” नामक व्हाट्सएप ग्रुप का सदस्य था, जिसमें उसने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ और आपत्तिजनक संदेश साझा किए, लोगों को एकजुट होने और हिंसा के लिए उकसाया। सोलंकी ने ग्रुप में हथियार और सहायता देने की भी पेशकश की थी, जिससे अन्य सदस्यों को अपराध के लिए प्रेरित किया गया।
हालांकि, अदालत ने कहा कि व्हाट्सएप चैट को हत्या के आरोप में “मूल साक्ष्य” के रूप में नहीं माना जा सकता, केवल सहायक साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। जब तक दंगाई भीड़ की पहचान स्पष्ट न हो, किसी पर “विकेरियस लाइबिलिटी” (परोक्ष जिम्मेदारी) नहीं डाली जा सकती।
अदालत ने हत्या, दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा और अन्य आरोपों से 12 आरोपियों को बरी कर दिया।
केवल लोकेश सोलंकी को आईपीसी की धारा 153A और 505 के तहत दोषी पाया गया, क्योंकि उसने धार्मिक आधार पर वैमनस्य फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने का काम किया था।

