झारखंड की सावर जनजाति ने आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया ‘मधुर कदम’

जमशेदपुर, 14 जून (पीटीआई)

झारखंड की आदिम सावर जनजाति सदियों से जंगलों में शहद संग्रहण पर निर्भर रही है, लेकिन अब सरकारी योजनाओं की मदद से उन्होंने ‘मधुर क्रांति’ की शुरुआत की है। अब वे अपने शहद को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग के जरिए ज्यादा लोगों तक पहुंचा रहे हैं।

यह बदलाव पूर्वी सिंहभूम के बोड़ाम प्रखंड के खोखरो गांव में सितंबर 2024 में शुरू हुआ, जब पीएम-जनमन (जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान) योजना के तहत वन धन विकास केंद्र (VDVK) की स्थापना की गई।

एक वरिष्ठ जिला अधिकारी ने बताया, “पहले सावर सालाना लगभग दो टन जंगल शहद इकट्ठा करते थे, लेकिन उचित विपणन, मूल्य निर्धारण और भंडारण की सुविधा न होने के कारण उनकी मेहनत का उचित लाभ नहीं मिलता था। अब हालात बदल रहे हैं।”

परंपरागत रूप से महुआ, पत्ते, झाड़ू और शहद जैसे गैर-काष्ठ वन उत्पादों पर निर्भर सावर समुदाय अब एक संगठित उद्यम की ओर बढ़ रहा है।

उन्हें वैज्ञानिक तरीके से शहद संग्रहण, मधुमक्खी पालन, प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग की ट्रेनिंग दी गई।

महिलाओं को विशेष रूप से स्वच्छता, छानने और पैकिंग की प्रक्रिया में प्रशिक्षित किया गया। 30 परिवारों को कुल्हाड़ी, टोकरा, फनल, दस्ताने, हेलमेट और जार जैसी सामग्री भी उपलब्ध कराई गई।

बोड़ाम के बीडीओ किकु महतो ने बताया, “इस पहल का मुख्य उद्देश्य सावर समेत विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। हम चाहते हैं कि महिलाएं, जिन्होंने पहले से ही स्वयं सहायता समूह बना लिया है, शहद उत्पादन से लेकर पैकेजिंग और विपणन तक पूरी तरह आत्मनिर्भर बनें।”

महतो ने बताया कि प्रशिक्षण झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) द्वारा दिया जा रहा है।

“हम बोड़ाम हनी ब्रांड को बढ़ावा देने के लिए कुछ स्थानीय एजेंसियों को जोड़ने की भी योजना बना रहे हैं। भविष्य में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे फ्लिपकार्ट और अमेज़न पर भी शहद बेचने की संभावना है, क्योंकि हमारा शहद शुद्ध और स्वच्छ है—इसे एक अच्छा मंच मिलना चाहिए।”

जिलाधिकारी कर्ण सत्यार्थी ने कहा कि अब ध्यान नए और स्थायी बाजार की तलाश पर है, ताकि उत्पादकों को उनके उत्पाद का सही मूल्य मिल सके।

उन्होंने यह भी कहा कि बोड़ाम जैसे क्षेत्रों में अन्य आजीविका विकल्पों की भी संभावना है और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए संस्थागत सहयोग दिया जाएगा।

यह पहल सावर जनजाति को आत्मनिर्भरता की