दलाई लामा अपने 90वें जन्मदिन पर पुनर्जन्म और अवतार पर बोल सकते हैं: फ्रेंच विद्वान

Dalai Lama

शिमला, 28 जून (पीटीआई) — तिब्बती परंपरा में सदियों से रचित ‘पुनर्जन्म और अवतार’ की आध्यात्मिक प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाना चाहिए, ऐसा कहना है फ्रांसीसी विद्वान और तिब्बती मामलों के विशेषज्ञ क्लॉद आर्पी का। उन्होंने चेतावनी दी कि चीन इस पवित्र परंपरा को “हाईजैक” करने की कोशिश कर रहा है।

शनिवार को आर्मी ट्रेनिंग कमांड (ARTRAC) में आयोजित संगोष्ठी ‘इंटरवोवन रूट्स: साझा भारत-तिब्बत विरासत’ को संबोधित करते हुए आर्पी ने कहा कि तिब्बती आध्यात्मिक प्रमुख दलाई लामा अपने 90वें जन्मदिन पर इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण बात कह सकते हैं और पुनर्जन्म या अवतार से जुड़ा निर्णय केवल उन्हीं पर निर्भर करता है।

सेंट्रल कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने अपने मुख्य भाषण में सांस्कृतिक कूटनीति को राष्ट्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया और भारत की क्षेत्रीय एवं सभ्यतागत अखंडता को संरक्षित रखने में सेना की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

क्लॉद आर्पी ने याद दिलाया कि 2011 में धर्मशाला में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन में दलाई लामा ने पुनर्जन्म और अवतार की अवधारणाओं पर विस्तार से चर्चा की थी। इस सम्मेलन में 100 से अधिक वरिष्ठ भिक्षु और सभी तिब्बती एवं बौद्ध संप्रदायों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

उन्होंने कहा कि दलाई लामा ने तब भी संकेत दिया था कि वे अपने 90वें जन्मदिन (6 जुलाई) पर पुनर्जन्म पर कुछ कहेंगे।

आर्पी ने भारत में तिब्बती आबादी में निरंतर गिरावट पर चिंता जताई और कहा कि लगभग 40 प्रतिशत तिब्बती भारत छोड़ चुके हैं। उन्होंने नगरी और पश्चिमी तिब्बत जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंधों को फिर से सशक्त करने की आवश्यकता पर बल दिया।

अपने संबोधन में लेफ्टिनेंट जनरल सेनगुप्ता ने भारत-तिब्बत के गहरे ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा, “भारत और तिब्बत दो प्राचीन सभ्यताएं हैं जिनकी जड़ें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और जो आज भी साझा पहचान को आकार दे रही हैं।”
रणनीतिक संदर्भ में उन्होंने कहा, “1962 के युद्ध से लेकर नाथू ला संघर्ष तक हमने देखा है कि इस इलाके की भौगोलिक परिस्थितियां न केवल सतर्कता, बल्कि निगरानी, तकनीकी संपर्क और एक सूक्ष्म रणनीति की मांग करती हैं।”

संगोष्ठी का समापन सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को मजबूत करने, पुरातात्विक अनुसंधान को बढ़ावा देने, अभिलेखागार तक पहुंच सुलभ कराने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को पुनर्जीवित करने की अपील के साथ हुआ। इसमें कैलाश यात्रा के लिए नए मार्ग खोलने, सीमा पार स्थानीय रेडियो प्रसारण में सुधार और हिमालयी भाषाओं के संरक्षण की सिफारिशें भी की गईं। (पीटीआई) BPL RT RT

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