नई दिल्ली, 9 जुलाई (PTI) – अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCST) ने ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना के प्रभाव और बाघ अभयारण्यों से गांवों के स्थानांतरण पर जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया है। आयोग ने इसका कारण संसदीय विशेषाधिकार और अन्य कानूनी अपवादों का हवाला दिया है।
PTI संवाददाता ने 3 अप्रैल को एक आरटीआई आवेदन दायर किया था, जिसमें 1 जनवरी 2022 के बाद से आयोग की सभी बैठकों के विवरण, जनजातीय मामलों के मंत्रालय के साथ ग्रेट निकोबार परियोजना और ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों’ (PVTGs) जैसे शॉम्पेन्स पर इसके प्रभाव को लेकर हुए पत्राचार और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा बाघ अभयारण्यों के कोर क्षेत्रों से गांवों को स्थानांतरित करने के निर्देश से संबंधित दस्तावेज मांगे गए थे।
आयोग ने 9 जून को इस आवेदन को यह कहते हुए निपटा दिया कि सभी बैठक विवरण उसकी वेबसाइट (http://ncst.nic.in) पर उपलब्ध हैं। हालांकि, वेबसाइट पर 6 अप्रैल 2021 के बाद की बैठकों का विवरण अभी तक अपलोड नहीं किया गया है।
ग्रेट निकोबार परियोजना और NTCA के निर्देश से जुड़े सवालों पर आयोग ने RTI आवेदक से “NCST में संबंधित फाइल नंबर प्रदान करने” को कहा।
पहली अपील पर 2 जुलाई को आयोग ने उत्तर दिया कि मांगी गई जानकारी संविधानिक प्रावधानों और RTI अधिनियम की धारा 8 के तहत सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है।
NCST के उप सचिव और प्रथम अपीलीय प्राधिकरण (FAA) वाई पी यादव ने अपने उत्तर में संविधान के अनुच्छेद 338A का हवाला दिया, जिसके तहत आयोग राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करता है और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों से संबंधित शिकायतों की जांच करता है।
RTI उत्तर में कहा गया कि चूंकि NCST की रिपोर्ट संसद में पेश की जाती हैं, इसलिए ऐसी जानकारी RTI अधिनियम के तहत साझा करने का दायित्व नहीं बनता।
आयोग ने RTI अधिनियम की धारा 8 की उन धाराओं का भी हवाला दिया, जिनके तहत सूचना का खुलासा नहीं किया जा सकता, जैसे कि यदि वह “संसदीय विशेषाधिकार” का उल्लंघन करे, किसी व्यक्ति की जान या सुरक्षा को खतरे में डाले, सूचना स्रोत की पहचान करे या किसी जांच में बाधा डाले।
2009 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि “जन सूचना प्राधिकरण नागरिक को यह बताने के लिए बाध्य नहीं है कि कोई कार्य क्यों किया गया या नहीं किया गया।”
जनजातीय अधिकार विशेषज्ञों ने कहा कि आयोग का अपने ही बैठकों की जानकारी देने से इनकार करना पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही की भावना के खिलाफ है।
एक जनजातीय अधिकार शोधकर्ता ने कहा, “NCST एक संवैधानिक निकाय है जिसे जनजातीय हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है। अगर यह अपने कार्यों की बुनियादी जानकारी देने से इनकार करता है, तो ऐसे निकाय की स्थापना का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।”
यह इनकार ऐसे समय में आया है जब ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही है। उनका मानना है कि यह परियोजना स्वदेशी समुदायों को विस्थापित कर सकती है और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है।
‘ग्रेट निकोबार का समग्र विकास’ नामक इस परियोजना में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और पावर प्लांट का निर्माण शामिल है, जो 160 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला होगा। इसमें 130 वर्ग किलोमीटर जंगल शामिल हैं, जहां निकोबारी जनजाति और लगभग 200–300 की आबादी वाले शॉम्पेन जैसे PVTG निवास करते हैं।
इसी तरह, बाघ अभयारण्यों से गांवों के स्थानांतरण के लिए NTCA के निर्देश पर भी विवाद है, जिसमें प्रभावित जनजातीय समुदायों से परामर्श नहीं करने और वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन करने के आरोप लगे हैं।
जून में PTI को दिए एक साक्षात्कार में NCST सदस्य आशा लकड़ा ने कहा कि ग्रेट निकोबार के जनजातीय समुदाय विकास के विरोध में नहीं हैं, लेकिन उन्हें परियोजना की पूरी जानकारी नहीं है।
हालांकि, लिटिल और ग्रेट निकोबार ट्राइबल काउंसिल के अध्यक्ष बार्नाबस मंजु ने PTI को बताया कि उन्हें बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया और इसके बारे में केवल स्थानीय मीडिया से जानकारी मिली।
परिषद ने नवंबर 2022 में पर्यावरण मंत्रालय और अंडमान प्रशासन को पत्र लिखकर अगस्त 2022 में दिए गए ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) को वापस ले लिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि NOC प्राप्त करते समय महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई गईं।
अप्रैल 2023 में NCST ने अंडमान प्रशासन को एक नोटिस जारी कर परियोजना से संबंधित तथ्यों और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी थी।
पिछले महीने एक प्रेस वार्ता में केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल उरांव ने कहा कि मंत्रालय इस परियोजना पर जनजातीय समुदायों की आपत्तियों की जांच कर रहा है।
फरवरी 2023 में PTI को दिए एक साक्षात्कार में NCST के पूर्व कार्यवाहक उपाध्यक्ष अनंता नायक ने इस “रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण” परियोजना की आलोचना को “अंतरराष्ट्रीय साजिश” करार दिया था।
उन्होंने कहा था कि किसी भी सरकार की प्राथमिक चिंता “राष्ट्रीय सुरक्षा” होनी चाहिए।
ग्रेट निकोबार द्वीप भारत के लिए रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह भारत को बंगाल की खाड़ी में प्रभुत्व और दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंच प्रदान करता है।
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