नई दिल्ली, 14 जुलाई (पीटीआई) — केंद्र सरकार ने सोमवार को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) पर लगाए गए पांच साल के प्रतिबंध को बरकरार रखने वाले आदेश के खिलाफ दायर याचिका की स्वीकार्यता पर दिल्ली हाईकोर्ट में आपत्ति जताई।
केंद्र ने मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव গেডेला की पीठ को बताया कि यह याचिका स्वीकार्य नहीं है क्योंकि ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता हाईकोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश ने की थी, इसलिए इस आदेश को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कहा, “मेरी प्रारंभिक आपत्ति है कि रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है। अनुच्छेद 226 या 227 के तहत राहत उपलब्ध नहीं है। केवल अनुच्छेद 136 के तहत ही राहत मिल सकती है।”
उन्होंने आगे कहा, “ट्रिब्यूनल हाईकोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश द्वारा संचालित था और हाईकोर्ट का न्यायाधीश इस अदालत के अधीनस्थ नहीं है। अनुच्छेद 227 अधीनस्थ अदालतों पर लागू होता है।”
पीएफआई के वकील ने तर्क दिया कि इस मुद्दे पर पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई हो चुकी है, इसलिए याचिका स्वीकार्य है।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त को तय की है।
पीएफआई ने 21 मार्च, 2024 के गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें 27 सितंबर, 2022 को केंद्र द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को बरकरार रखा गया था।
मामले में अदालत ने अभी तक औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया है।
केंद्र सरकार ने पीएफआई को पांच साल के लिए प्रतिबंधित किया है, उन पर अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों (जैसे आईएसआईएस) से संबंध और देश में सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने का आरोप है।
केंद्र ने पीएफआई और उसके सहयोगी या संबद्ध संगठनों—जैसे रिहैब इंडिया फाउंडेशन, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया इमाम्स काउंसिल, नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन, नेशनल वुमेन्स फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एमपावर इंडिया फाउंडेशन और रिहैब फाउंडेशन, केरल—को “गैरकानूनी संगठन” घोषित किया है।
(PTI SKV AMK)
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