महज MLC में चोट न दिखने से नाबालिग की पिटाई की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

नई दिल्ली, 19 जुलाई (PTI) — दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर कि किसी नाबालिग लड़की की मेडिकल रिपोर्ट (MLC) में चोट के निशान नहीं हैं, उसकी ओर से दी गई स्पष्ट गवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिसमें उसने मारपीट की बात कही हो।

मामला क्या है?

न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने यह टिप्पणी एक ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलटते हुए की, जिसमें अदालत ने एक व्यक्ति और उसकी पत्नी को मारपीट (IPC धारा 323) और गलत तरीके से बंधक बनाने (IPC धारा 342) के आरोपों से बरी कर दिया था।

यह मामला 2016 का है, जहां पीड़िता एक कंपनी में रिसेप्शनिस्ट के रूप में कार्यरत थी और उसने मालिक (आरोपी व्यक्ति) और उसकी पत्नी पर आरोप लगाए थे।

ट्रायल कोर्ट का निर्णय

  • आरोपी पुरुष पर बलात्कार और अप्राकृतिक यौनाचार (रेप और unnatural sex) के आरोप तो तय किए गए,

  • लेकिन उस और उसकी पत्नी को मारपीट और बंधक बनाने के आरोपों से मुक्त कर दिया गया, यह कहते हुए कि मेडिकल रिपोर्ट में किसी तरह की चोट नहीं पाई गई।

हाईकोर्ट का रुख

हाईकोर्ट ने कहा:

“केवल इसलिए कि पीड़िता की MLC (मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट) में चोटें नहीं दिखाई दे रही हैं, इस आधार पर उसकी स्पष्ट गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसके साथ मारपीट हुई।”

  • धारा 323 IPC (जानबूझकर चोट पहुंचाना) के तहत आरोप तय करने की जरूरत को हाईकोर्ट ने उचित ठहराया।

  • कोर्ट ने कहा कि यह निष्कर्ष कि क्या पेट में लात मारना या सिर को दीवार से टकराना MLC में दिखेगा या नहीं, यह कई कारणों पर निर्भर करता है और इसे मुकदमे की प्रक्रिया के दौरान ही समझा जा सकता है, न कि आरोप तय करने के चरण में।

confinement यानी बंधक बनाने को लेकर हाईकोर्ट का तर्क

  • याचिका में लड़की ने एफआईआर में साफ कहा था:

“मुझे अपने घर में बंद कर के रखा गया।”

  • अदालत ने कहा कि बंधक बनाने के लिए जरूरी नहीं कि व्यक्ति के हाथ-पैर बांधे जाएं

  • यदि किसी को उसके कमरे या घर में उसकी इच्छा के विरुद्ध बंद किया जाए, तो यह धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत मामला बनता है।

निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि मारपीट और गैरकानूनी बंदी बनाने के आरोपों पर नए सिरे से विचार किया जाए और कानूनी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए आरोपों की समीक्षा की जाए।

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