नई दिल्ली, 4 अगस्त (PTI) — कोर्नियल अंधत्व, जिसे पहले मुख्यतः बुजुर्गों के बीच माना जाता था, अब भारत के युवा वर्ग के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। देशभर के किशोरों और युवा वयस्कों में इस गंभीर लेकिन ज्यादातर रोकी जा सकने वाली दृष्टिहीनता के मामलों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है।
यह चिंताजनक प्रवृत्ति हाल ही में दिल्ली में आयोजित इंडियन सोसाइटी ऑफ कॉर्निया एंड केराटो-रिफ्रैक्टिव सर्जन्स (ISCKRS) सम्मेलन 2025 में सामने आई। इसमें देश के शीर्ष नेत्र विशेषज्ञ राष्ट्रीय आंख स्वास्थ्य आपातकाल की बात कर रहे थे।
ISCKRS के महासचिव और AIIMS नई दिल्ली के नेत्रविज्ञान प्रोफेसर डॉ. राजेश सिन्हा ने कहा कि भारत में 30 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों में नए कोर्नियल अंधत्व के मामलों की संख्या में विस्फोटक वृद्धि हो रही है।
उन्होंने कहा, “हम एक खतरनाक बदलाव देख रहे हैं। युवा लोग पूरी तरह से टाला जा सकने वाली वजहों से अपनी दृष्टि खो रहे हैं। सामान्य संक्रमण, इलाज न किए गए चोटें, और जागरूकता की कमी स्थायी दृष्टिहीनता में बदल रही है।”
कोर्नियल अंधत्व तब होता है जब आंख का पारदर्शी अग्रभाग, कॉर्निया, संक्रमण, चोट या पोषण की कमी के कारण धुँधला या زخ्मी हो जाता है।
कोर्नियल धुंधलापन अब भारत में अंधत्व का दूसरा प्रमुख कारण बन चुका है, जिससे हर साल हज़ारों लोग प्रभावित हो रहे हैं। विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि भारत में हर साल 20,000 से 25,000 नए कोर्नियल अंधत्व के मामले सामने आते हैं और यह संख्या बढ़ रही है।
ISCKRS पैनल ने इस बढ़ोतरी के कई कारण बताए, जिनमें खासकर कृषि, मैन्युअल श्रम और औद्योगिक कार्यों में लगे युवाओं के बीच चोटें शामिल हैं।
इन चोटों का इलाज अक्सर नहीं होता या घरेलू उपचार से किया जाता है, जिससे गंभीर संक्रमण और निशान बन जाते हैं। इसके साथ ही देश के कई हिस्सों में अभी भी विटामिन A की कमी गंभीर कॉर्नियल नुकसान का कारण बनी हुई है, खासकर बच्चों और किशोरों में।
इन समस्याओं को कम जागरूकता, शुरुआती निदान की कमी और ग्रामीण तथा सुविधाहीन क्षेत्रों में विशेषज्ञ नेत्र देखभाल की पहुंच की कमी और बढ़ा रही है।
सिर गंगा राम अस्पताल और दिल्ली आई सेंटर की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. इक़ेदा लाल ने कहा, “यह स्वीकार्य नहीं कि वर्ष 2025 में भी हम हजारों युवा आंखों को पूरी तरह टाले जा सकने वाले कारणों से खो रहे हैं। भारत को युवाओं में कोर्नियल अंधत्व को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देखना चाहिए। एक राष्ट्रीय रणनीति और मजबूत सामुदायिक सहभागिता की जरूरत है।”
डॉ. सिन्हा ने बताया कि भारत के पास कोर्नियल अंधत्व का इलाज करने की क्षमता गंभीर रूप से सीमित है। देश में सालाना 1,00,000 से अधिक कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की आवश्यकता है, लेकिन केवल लगभग 40,000 ही किए जा पाते हैं, जो जरूरत का लगभग एक तिहाई है।
यह कमी मुख्यतः दाता कॉर्निया की कमी, प्रशिक्षित कॉर्नियल सर्जन की संख्या कम होने और नेत्र बैंक के अपर्याप्त उपकरणों के कारण है।
ISCKRS फोरम ने बेहतर अवसंरचना निर्माण, मानव संसाधन प्रशिक्षण और सार्वजनिक जागरूकता के माध्यम से स्वैच्छिक आंख दान को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. लाल ने प्रारंभिक पहचान और रोकथाम देखभाल की महत्ता विशेष रूप से ग्रामीण और स्कूल आधारित स्वास्थ्य कार्यक्रमों में रेखांकित की।
उन्होंने कहा, “रेडनेस, जलन या धुंधली दृष्टि जैसे मामूली लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई मरीज जब तृतीयक केंद्रों पर आते हैं, तब तक नुकसान अपूरणीय हो चुका होता है।”
उन्होंने टेली-ऑपटल्मोलॉजी और मोबाइल आई केयर क्लीनिक के माध्यम से शहरी-ग्रामीण भेद को पाटने की बात भी कही।
सम्मेलन की प्रमुख सिफारिशों में नेत्र स्वच्छता और चोट रोकथाम पर व्यापक जागरूकता अभियान, और देशभर में 50-100 नए नेत्र बैंक का निर्माण शामिल था।
साथ ही अगले पांच वर्षों में 1,000 नए कॉर्नियल विशेषज्ञों को प्रशिक्षित करने का प्रस्ताव भी रखा गया, जिसका समर्थन सरकार और निजी क्षेत्र दोनों करेंगे।
ISCKRS ने केंद्र एवं राज्य सरकारों, एनजीओ, शैक्षणिक संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों के बीच तत्काल सहयोग पर जोर दिया ताकि इस बढ़ते खतरे से निपटा जा सके।
स्कूलों में आंख जांच कार्यक्रम को मजबूत किया जाना चाहिए, उच्च जोखिम वाले कार्यक्षेत्रों में सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करवाए जाएं, और परिवारों को पोषण व नियमित नेत्र देखभाल की महत्ता के प्रति शिक्षित किया जाना चाहिए।
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