नई दिल्ली, 12 अगस्त (पीटीआई) – दिल्ली हाई कोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में फिर से मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। यह मामला गाजियाबाद के राज नगर क्षेत्र में एक व्यक्ति की मौत से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा है कि यदि मामले में उचित और निष्पक्ष जांच व मुकदमा सुनिश्चित नहीं किया गया तो इससे कानूनी व्यवस्था में विश्वास खो जाने का खतरा होगा और समाज के हितों को भी क्षति पहुंचेगी।
न्यायमंत्रियों सुब्रमण्यम प्रसाद और हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने स्वसंवेदनशील तरीके से मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि 1986 के फैसले में जांच और ट्रायल दोनों ही जल्दबाजी में किए गए और कई कानूनी त्रुटियों के कारण न्याय प्रक्रिया प्रभावित हुई।
कोर्ट ने नोट किया कि इस मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के कई स्पष्ट कानून के उल्लंघन और गवाहों के बयान में विरोधाभासों के आधार पर अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया गया था, जिससे पीड़ित के परिवार को न्याय नहीं मिल सका। इसके अलावा, सीबीआई ने कठिनाइयों के बावजूद पर्याप्त सबूत जुटाने का प्रयास नहीं किया।
याचिका में यह बताया गया कि पीड़िता की पत्नी ने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने उनके पति और उनके घर को आग के हवाले कर दिया, जिससे उनकी मौत हो गई।
हालांकि, साल 1986 में ट्रायल कोर्ट ने चार अभियुक्तों को गिरफ्तार आरोपों से बरी कर दिया था।
लगभग 40 वर्षों के बाद, हाई कोर्ट ने 1986 के बरी करने के फैसले को रद्द करते हुए पुनः मुकदमे की अनुमति दी है और सीबीआई को अधिक प्रयास करने का निर्देश दिया है कि वे उपलब्ध साक्ष्यों को जुटाएं और सभी प्रासंगिक गवाहों जैसे मृतक के बच्चे, पड़ोसी और अन्य उपस्थित लोगों को जांच में शामिल करें।
न्यायालय ने कहा कि यह मामला ‘अपवादात्मक’ है और समाज एवं पीड़ितों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए पुनः सही जांच एवं सुनवाई आवश्यक है। अदालत ने सीबीआई की जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि वे क्रिमिनल प्रोसिड्योर कोड की शक्तियों का उपयोग कर पूरी परीक्षा कर जांच के शेष सूबूत इकट्ठे करें ताकि अभियुक्त बच न सकें।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले की सुनवाई जल्दबाजी में की गई और जांचकर्ताओं व न्यायाधीश की लापरवाही से अपराधियों को फायदा मिला।
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