सीमेंट में जकड़े पेड़: दिल्ली में बारिश के दौरान पेड़ों के गिरने से ‘कंक्रीटीकरण’ पर फिर ध्यान केंद्रित

नई दिल्ली, 14 अगस्त (पीटीआई) – गुरुवार को दिल्ली में हुई भारी बारिश ने न केवल सड़कों को पानी में डुबो दिया और ट्रैफिक को ठप कर दिया, बल्कि शहर की हरियाली पर भी कहर बरपाया। दिनभर में 25 से अधिक पेड़ गिर गए।

ऐसी ही एक घटना कालकाजी में व्यस्त सड़क पर हुई, जहां एक पेड़ कार पर गिर गया, जिससे 50 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो गई और उसकी बेटी गंभीर रूप से घायल हो गई।

पर्यावरणविदों का कहना है कि इन बार-बार गिरते पेड़ों के पीछे एक बड़ी मानवजनित वजह है — कंक्रीटीकरण। राजधानी में अक्सर फुटपाथ और सड़क किनारे के हिस्से पेड़ों के तनों तक सीमेंट से ढक दिए जाते हैं। उद्देश्य भले ही साफ-सफाई और मजबूती बढ़ाना हो, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक यह प्रक्रिया पेड़ों की जड़ों को पानी और हवा से वंचित कर उन्हें कमजोर कर देती है।

सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट के कार्यकारी निदेशक सुनील कुमार अलेडिया ने कहा, “कंक्रीटीकरण इन गिरते पेड़ों का मुख्य कारण है। बचपन से इसके नुकसान के बारे में सुनते आए हैं, लेकिन इस पर कार्रवाई बहुत कम हुई है। NGT ने दिल्ली में पेड़ों को काटने पर रोक लगाई है, लेकिन यह काफी नहीं है। काले पड़ चुके कई पेड़ के तने इस बात का संकेत हैं कि उन्हें पर्याप्त पोषण नहीं मिल रहा।”

ग्रीनपीस इंडिया के जलवायु और ऊर्जा अभियानकर्ता आक़िज़ फ़ारूक़ ने कहा कि बिना काटे भी पेड़ों को धीरे-धीरे सीमेंट में कैद कर उनकी मौत सुनिश्चित की जा रही है। “आप देखेंगे कि पार्क या जंगलों में पेड़ बहुत कम गिरते हैं, लेकिन सड़क किनारे, जिनकी जड़ें सीमेंट के नीचे दब जाती हैं, वे जल्दी गिर जाते हैं।”

विज्ञान सीधा है — पेड़ों को ढीली मिट्टी चाहिए ताकि जड़ें फैल सकें और पानी-सांस ले सकें। लेकिन जब सीमेंट तने तक ढक देता है, तो पानी और हवा का प्रवाह रुक जाता है और जड़ें सतही व कमजोर रह जाती हैं। बरसात में जब तना फूलता है, तो सीमेंट शिकंजे का काम करता है और जड़ों की पकड़ ढीली पड़ जाती है।

2013 के NGT आदेश में पेड़ों के चारों ओर एक मीटर दायरे में सीमेंट हटाने का निर्देश था, लेकिन एक दशक बाद भी इसका पालन अधूरा है।

दिल्ली के पर्यावरणविद वर्हेन खन्ना ने कहा, “तने के चारों ओर सीमेंट पानी और हवा को रोक देता है और तने को फैलने से भी। मानसून में यह और खतरनाक हो जाता है — जड़ों की पकड़ छूट जाती है और अगर सड़क खोदने से जड़ें कट जाएं, तो गिरने का खतरा बढ़ जाता है।”

शहरी नियोजकों का मानना है कि समस्या केवल कमजोर लागू व्यवस्था की नहीं, बल्कि जनजागरूकता की कमी की भी है। खाली छोड़े गए पेड़ों के आस-पास का हिस्सा अक्सर अतिक्रमण या कूड़ा फेंकने के लिए इस्तेमाल होता है, जिसकी रोकथाम के चलते नगर निकाय इसे सीमेंट से ढक देते हैं। लेकिन इस सफाई का नतीजा अक्सर एक गिरा हुआ पेड़ बन जाता है।

कालकाजी की घटना एक और चेतावनी है कि दिल्ली के पेड़ ज़मीन के नीचे ही कमजोर हो जाते हैं — बारिश सिर्फ उन्हें धक्का देती है, लेकिन असली चोट सीमेंट ही करता है।

श्रेणी: ब्रेकिंग न्यूज़

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