लखनऊ, 20 अगस्त (पीटीआई) : यहां की एक विशेष अदालत ने एक अधिवक्ता को विपक्षियों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कराने के लिए दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है और उस पर 5.10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने मंगलवार को यह फैसला सुनाते हुए अधिवक्ता परमानंद गुप्ता को साजिश और कानून के दुरुपयोग का दोषी करार दिया। अदालत ने माना कि गुप्ता ने अपनी प्रतिद्वंद्वियों को फंसाने के लिए दलित महिला पूजा रावत के नाम से झूठे मुकदमे दर्ज कराए।
विशेष लोक अभियोजक अरविंद मिश्रा ने बताया कि गुप्ता ने रावत के साथ मिलकर कम से कम 18 मुकदमे अपने नाम से और 11 मुकदमे रावत के नाम से दर्ज कराए। इनमें से कई मुकदमे उसके प्रतिद्वंदी अरविंद यादव और उनके परिवार के खिलाफ संपत्ति विवाद के चलते दर्ज किए गए थे। इन फर्जी मामलों में दुष्कर्म और छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोप भी शामिल थे।
यह मामला तब सामने आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में बहस के दौरान संबंधित थानों से रिपोर्ट तलब की गई। 5 मार्च 2025 को हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी।
जांच में सामने आया कि गुप्ता ने रावत की दलित पहचान का दुरुपयोग करते हुए यादव और उनके परिवार को झूठे मामलों में फंसाया। जांच के दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि घटनास्थल पर बताए गए समय में रावत कभी मौजूद नहीं थीं और जिस घर को उसने किराए पर लेने का दावा किया था, वह वास्तव में यादव परिवार द्वारा निर्माणाधीन था।
बाद में, 4 अगस्त 2025 को रावत ने खुद अदालत में आवेदन देकर स्वीकार किया कि गुप्ता और उसकी पत्नी संगीता (जो एक ब्यूटी पार्लर चलाती हैं और जहां वह सहायक के रूप में काम करती थीं) ने उसे फंसा लिया था। रावत ने अदालत में स्वीकार किया कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने झूठे यौन उत्पीड़न के बयान देने के लिए मजबूर किया गया और उसने माफी की गुहार लगाई। अदालत ने उसे सशर्त माफी प्रदान की।
न्यायाधीश ने कहा कि गुप्ता पूरी तरह से जानता था कि ये आरोप आजीवन कारावास तक की सजा दिला सकते हैं, फिर भी उसने साजिश रची। ऐसे में उसे आदर्श दंड मिलना चाहिए।
अदालत ने गुप्ता को आजीवन कारावास की सजा सुनाने के साथ ही आदेश दिया कि फैसले की एक प्रति उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को भेजी जाए, ताकि “परमानंद गुप्ता जैसे अपराधी वकील अदालत परिसर में प्रवेश कर कानून की प्रैक्टिस न कर सकें और न्यायपालिका की पवित्रता बनी रहे।”
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